शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन





एक बहुत लम्बे इंतज़ार और लम्बे सफर के बाद हम आज उस जगह पर पहुंचे हुए थे, जहाँ हर दिन लाख लोग अपनी अपनी मुरादें लेकर आते रहते हैं लेकिन मैं यहाँ कोई मुराद या मन्नत लेकर नहीं आया था, मैं तो बस उस दिव्य जगह के दिव्य दर्शन के लिए यहाँ आया था। हर दिन सोचा करता था कि आखिर ऐसा क्या है उस जगह पर जहाँ हर दिन इतने सारे लोग जाते हैं और आज हम भी उसी जगह पर पहुंचे हुए हैं। शहरों की भाग दौड़ वाली जिंदगी से दूर यहाँ एक अलग ही शांति थी और इतने सारे लोग एक दूसरे से अनजान होते हुए भी अनजान नहीं दिख रहे थे। यहाँ एक साथ पूरे देश से आये हुए लोग देखे जा सकते हैं। सबकी अलग भाषा, अलग रहन सहन, अलग खान पान होते हुए भी यहाँ सब एक ही रंग में रंगे हुए नज़र आ रहे थे और वो रंग था भक्ति का। इस भीड़ में कुछ दूसरे देश के लोग भी दिखाई दे जाते थे और वो भी यहाँ आकर भक्ति के रंग में सराबोर थे। यहाँ आया हुआ हर व्यक्ति देश, राज्य, जाति, वर्ग, गरीब, अमीर को भूल कर बस भक्ति में लीन अपनी ही धुन में चला जा रहा था। यहाँ की स्थिति को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आ रहा था कि काश हर जगह बस ऐसी ही शांति हो, जहाँ कोई किसी के आगे या पीछे न होकर बस एक साथ चल रहे हों। 

आइये अब आज की अपनी बात करते हैं। कल रात सोने से पहले हमने मोबाइल में सुबह 3 बजे का अलार्म लगाया था और 3 बजते ही अलार्म बजना आरंभ हो गया। अलार्म के साथ मेरी नींद भी खुल गई। सफर की थकान के कारण बेड से उठने का मन तो बिलकुल नहीं हो रहा था।  मैंने अलार्म बंद किया और फिर से सोने की कोशिश करने लगे। दुबारा नींद भी नहीं आ पाई थी कि 5 मिनट बाद दूसरे मोबाइल में भी अलार्म बजने लगा। अब तो दोनों मोबाइल ने अपने हाजिरी लगा दी तो उठना ही था। खैर जैसे तैसे उठे और सबको जगा कर मैं नहाने चला गया। पानी बिल्कुल ठंडा था, जो कि नहाने लायक नहीं था। खैर मैं नहा तो ठन्डे पानी से भी लेता पर एक लम्बे सफर पर निकलने के कारण ठन्डे पानी से नहीं नहाया कि कहीं तबियत खराब हो गई तो फिर घुमक्कड़ी का आनंद ही जाता रहेगा। अब नहाने के लिए गरम पानी की जरूरत थी जो बाहर लगे गीज़र से पूरी हो गई। अब हम जल्दी से नहा कर तैयार हुए। सबको तैयार होने के लिए कहकर मैं ये देखने के लिए बाहर निकल गया कि दर्शन के समय कैसे और किस रास्ते से जाया जाये।




अभी सुबह के 4 बजे थे और बाहर कोई मिल नहीं रहा था जिससे कि कुछ पूछा जाये।  करीब एक घंटे से ज्यादा सड़क पर इधर उधर भटकने के बाद मैं वापस कमरे पर आ गया। यहाँ आते हुए मैंने कल्याण कट्टा में लोगो को अपने केश दान करते (मुंडन कराते) हुए देखा तो मन में खयाल आया कि क्यों न हम भी मुंडन करवा ही लें। मेरे इस प्रस्ताव का पत्नी और माताजी ने समर्थन कर दिया। कल्याण कट्टा (जहाँ मुंडन होता है) गेस्ट हाउस (कल्याण चौल्ट्री) के सामने ही था। हम सब लोग मुंडन करवाने चले गए। यहाँ जाते ही हमें एक स्लिप और आधा ब्लेड दिया गया। स्लिप पर सीट की संख्या लिखी हुई थी और वहीं पर आपका मुंडन होगा जो संख्या स्लिप पर लिखी हुई थी। अंदर गया तो कई बड़े बड़े हॉल में मुंडन कर्मचारी बैठे हुए थे और मुंडन करवाने वाले की भीड़ लगी हुई थी। हम लोगों की बारी आने पर हम सबने भी मुंडन करवाया और उसके बाद गेस्ट हाउस आ गए। एक बार तो पहले नहा ही चुके थे और मुंडन करवाने के बाद फिर से नहाने की जरूरत थी तो सबने फिर से नहाया।

मुझे यहाँ 131 और 133 नम्बर का कमरा मिला था। हम मंदिर जाने के लिए निकलने ही वाले थे कि इसी दौरान 132 नम्बर कमरे में ठहरे हुए कुछ लोग आये तो पूछने पर पता चला कि वो लोग दर्शन करके आ रहे हैं और 16 घंटे के बाद उन लोगों ने दर्शन किया था। खैर मैं पहले ही 300 रुपये वाला दर्शन के लिए ऑनलाइन ही बुकिंग करवा रखा था जिसकी बुकिंग तिरुमला तिरुपति देवसंस्थानम की वेबसाइट https://ttdsevaonline.com पर होती है और साथ में 2 लडडू भी मिलते हैं। दर्शन की बुकिंग हर घंटे के हिसाब से होती है और मेरा 10 बजे के दर्शन के लिए बुकिंग थी और जिसके लिए 2 घंटे पहले ATC कार पार्किंग एरिया में रिपोर्ट करनी थी। अब तक 6:15 बज चुके थे और हम लोग मंदिर दर्शन के लिए गेस्ट हाउस से निकल गए तो पता चला कि 300 रूपये वाले दर्शन के लिए धोती जरूरी है। खैर हमने 3 धोतियां खरीदी और फिर कमरे में आकर धोती पहन कर फिर से मंदिर के लिए निकल पड़े। यहाँ पुरुषों के लिए धोती अनिवार्य है तो महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार-कुरता अनिवार्य है। पश्चिमी सभ्यता के ड्रेस यहाँ निषेध है। मंदिर के पास जाकर कैमरा, मोबाइल, जूते-चप्पल रखने की मुसीबत से बचने के लिए हमने सब कुछ कमरे में ही छोड़ दिया और साथ में हर उस चीज़ को कमरे पर ही रहने दिया जो मंदिर में ले जाना निषेध था। बस दर्शन पर्ची और पहचान पत्र साथ में रखकर दर्शन के लिए निकले। पूछते पूछते हम 7:30 बजे ATC कार पार्किंग एरिया पहुँच गए।

ठीक 8 बजे अंदर जाने के लिए दरवाजा खोला गया और पर्ची देख देखकर सबको अंदर जाने दिया गया। कुछ आगे बढ़ने पर पर्ची के साथ साथ पहचान पत्र की जाँच करने के बाद ही आगे जाने दिया जा रहा था। कुछ आगे बढ़ने पर हमने देखा कि बड़े बड़े कई हॉल है जहाँ बैठ कर लोग दर्शन के लिए इंतजार कर रहे हैं। हर हॉल में करीब करीब 500-600 लोग थे और यहाँ सबके लिए खाने-पीने की पूरी व्यवस्था थी। जिस क्रम में हॉल में लोग बैठते है उसी क्रम के अनुसार उनको दर्शन के लिए भेजा जाता है। एक हॉल में बैठे लोगों को जब दर्शन के लिए भेजा जाता है तो उस खाली हुए हॉल में नए लोगों को बैठा दिया जाता है और यही क्रम चलता रहता है और 10-11 घंटे के इंतज़ार के बाद दर्शन की बारी आती है। मेरा 300 रुपये वाला बुकिंग था इसलिए मुझे कहीं इंतज़ार नहीं करना था और हम लोग आगे बढ़ते रहे आगे जाते जाते रास्ता सँकरा होता जा रहा था। वैसे ही सँकरे रास्ते से आगे बढे और कुछ आगे बढ़ने पर तिरुपति से तिरुमला तक पैदल आने वाले श्रद्धालुओं को इसी लाइन में मिला दिया गया तो भीड़ और ज्यादा हो गई। अब कुछ और आगे बढ़े तो यहाँ पर सुदर्शन लाइन (हॉल में बैठे लोगों)  को भी इसी लाइन में मिला दिया गया। अब इसका मतलब ये साफ है कि आप चाहे 1000 रूपये वाली पर्ची लो, या 300 वाली पर्ची या फिर चाहे फ्री वाली लाइन हो या तिरुपति से तिरुमला तक पैदल आये हो दर्शन सबको एक साथ ही करनी है बस फर्क ये है कि आपको घंटो तक इंतज़ार नहीं करना होता है और भीड़ में ज्यादा देर तक लाइन में रहना नहीं पड़ता है।

चलिए अब आगे बढ़ते हैं। थोड़ा और आगे बढ़ने पर हम मंदिर के मुख्य दरवाजे पर पहुंच गए। यहाँ एक ही दरवाजे से अंदर जाने और बाहर आने की प्रक्रिया चलती है। बाहर वाले को रोककर अंदर के लोगों को निकलने के बाद फिर अंदर जाने दिया जाता है। खैर लो जी हम मंदिर के अंदर भी पहुँच गए और धीरे धीरे गर्भ गृह वाले भवन में भी पहुँच गए, धीरे धीरे दर्शन के लिए लाइन आगे बढ़ रही थी और भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन कर रही थी। हमारी भी बारी आई और हमने भी भगवान्  वेंकटेश के दर्शन किये। करीब 12-15 फ़ीट की दूरी से भगवान्  वेंकटेश के दर्शन होते हैं और बस कुछ ही पल उनके सामने आप रुक सकते हैं, और ये कुछ ही पल बस सेकंड भर ही होता है और इस सेकंड भर में ही ऐसा प्रतीत होता है कि मैं मैं नहीं हूँ, बस सब कुछ भूलकर अपने आपको भगवान को समर्पित कर चुके हैं। हमारे दर्शन का समय 10 बजे का था लेकिन 9:30 बजे ही हमने दर्शन कर लिया।  दर्शन के बाद हम करीब 30 मिनट मंदिर प्रांगण में ही बैठे रहे। अब तक अंदर इतनी भीड़ हो गई थी कि मुझे जिसकी उम्मीद नहीं थी। भीड़ इतनी थी कि मंदिर से निकलने में करीब 30 मिनट का समय लगा।




मंदिर से निकलकर हम प्रसाद के लाइन में लग गए जहाँ सबको दही वाली खीर दी जा रही थी। प्रसाद ग्रहण करने के बाद हम लडडू लेने गए और लिए अपनी दर्शन पर्ची दिखाकर 6 लोगों के 12 लडडू लिया। ऑनलाइन दर्शन करने वाले लोगों को लडडू केवल 13 नंबर के काउंटर पर दिया जाता है और पैदल आने वाले और सुदर्शन लाइन से दर्शन करने वाले लोग किसी भी काउंटर से लडडू ले सकते हैं। वैसे एक बात तो है यहाँ के लडडू का कोई जवाब नहीं। लडडू लेने के बाद हम मंदिर परिसर और चीज़ो को देखने बाद करीब 11 बजे हम मेगा किचन की तरफ बढ़ गए। यहाँ एक साथ एक बार में हज़ार से ज्यादा लोग भोजन करते हैं। इतने लोगों के एक साथ भोजन करने की प्रक्रिया यहाँ पूरे दिन चलती है। एक तरफ से लोग आते है खाना खाकर दूसरे तरफ से निकलते जाते हैं। दूसरे लोगों के बैठने के पहले टेबल साफ करने की  प्रक्रिया है वो भी पलक झपकते ही होती है। खाना खाते खाते करीब 12 बज चुके थे। खाना खा चुकने के बाद या यूँ कहिये तो प्रसाद ग्रहण करने के बाद हम यहाँ से सीधे कमरे में आ गए। रास्ते में जगह जगह बैनर और बोर्ड पर पिछले महीने यहाँ दर्शन के लिए आये श्रद्धालुओं, अन्नप्रसादम ग्रहण करने वाले, लडडुओं की संख्या और मुंडन करवाने वाले लोगो की जानकारी उपलब्ध कराई गयी थी वो अपने आप में चौकाने वाली थी। 

दर्शन के लिए आये हुए श्रद्धालुओं की संख्या : 29,00,000 (29 लाख मतलब करीब 1 लाख लोग हर दिन)
अन्नप्रसादम ग्रहण करने वाले लोगों की संख्या : 78,00,000 (78 लाख )
मुंडन करवाने वाले लोगों की संख्या : 14,00,000 (14 लाख)
लडडुओं की संख्या : 1,50,00,000 (1.5 करोड़)

1 बजते बजते हम गेस्ट हाउस पहुंच गए और कुछ देर आराम करने करने बाद करीब 1:30 बजे हम फोटो खींचने और यहाँ के बाजार घूमने के लिए निकले। मंदिर से लौट कर आते हुए मुझे बरगद (तेलुगु में बरगद को मर्रीचटटु कहते हैं) का एक बहुत ही बड़ा पेड़ दिखा था और उसकी फोटो लेने के लिए हमें करीब 1 किलोमीटर जाना पड़ा। ये पेड़ जितने में फैला हुआ था कि इसकी छाया में करीब 500 लोग एक साथ बैठ सकते थे। हमने भी कुछ देर वहां उसकी छाया का आनंद लिया और कुछ सामान की खरीदारी करके वापस कमरे पर आ गए और रास्ते में एक जगह फिर से खाना भी खा लिया। अब तक 3:00 बजे चुके थे। अब हमें यहाँ से वापस तिरुपति जाना था। कुछ देर आराम करने और सामान पैक करते करते 4:30 बज गए। करीब 4:45 बजे हम गेस्ट हाउस से वापस जाने के लिए निकले और सीधा बस पड़ाव पर पहुंच गए। बस पड़ाव पर लोगों की भीड़ बहुत ही ज्यादा थी, फिर भी एक बस में मुझे सीट मिल गई। बस खुलने से पहले मैंने कंडक्टर से ये पूछ लेना उचित समझा कि मैंने आने-जाने का टिकट एक साथ ले लिया तो वो टिकट आपकी बस में मान्य है या नहीं। कंडक्टर के अनुसार मेरा टिकट तिरुमला आने वाले हर बस में मान्य था। वैसे तिरुपति से तिरुमला और तिरुमला से तिरुपति के लिए मंदिर समिति द्वारा संचालित फ्री बस सेवा भी उपलब्ध है, लेकिन फ्री होने कारण उसमे इतनी भीड़ होती है खड़े होकर भी यात्रा करना बहुत ही मुश्किल काम है। 




हमारी बस जल्दी ही बस यहाँ से तिरुपति के लिए प्रस्थान कर गई। जब रात में मैं तिरुपति से तिरुमला आ रहा था तो ऊपर से तिरुपति शहर ऐसा लग रहा था जैसे आकाश जमीन पर आ गया हो और इस समय पूरा तिरुपति शहर साफ दिख रहा था। इसकी खूबसूरती इस समय बिलकुल किसी सपने के शहर के जैसा लग रहा था। करीब एक घंटे के सफर के बाद 6:00 बजे बस तिरुपति रेलवे स्टेशन पहुँच गई। रेलवे स्टेशन के पास ही विष्णु निवासम में मैंने पहले से ही कमरा बुक कर रखा था। तिरुपति में मंदिर समिति के तीन गेस्ट हाउस हैं जिनके नाम माधवन, श्रीनिवासम और विष्णु निवासम, जिसमे से विष्णु निवासम तिरुपति रेलवे स्टेशन के सामने है। बस से उतरकर हम सीधा गेस्ट हाउस में गए और यहाँ मुझे चौथे मंज़िल पर 456 और 467 नंबर का कमरा मिला। कमरे में जाते ही सबने पहले रात की अधूरी नींद पूरी की और जब बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज से आँख खुली तो 8 बज चुके थे और बाहर भारी बारिश हो रही थी। अब तो तिरुपति का बाजार भी घूम पाना मुश्किल था। खाने के लिए पता किया तो मालूम हुआ कि खाने का इंतज़ाम दूसरी मंज़िल पर है और तिरुमला की तरह यहाँ भी खाना फ्री है। हम लोग दूसरी मंज़िल पर जाकर एक बार अन्नप्रसादम ग्रहण किये (खाना खाये) और फिर अपने कमरे में आकर कल की तैयारी करके सोने की तैयारी में ही थे कि मेरे एक मित्र नरेंद्र शोलेकर जी का एक मैसेज आया और उस मैसेज के अनुसार मुझे अपनी कल की योजना में बदलाव करना पड़ा और पद्मावती मंदिर में देवी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

ऐसे तो कल के मेरी प्लांनिग के अनुसार कल सुबह उठकर तिरुपति का बाजार घूमना था और फिर 10 बजे की ट्रेन से चेन्नई और फिर रामेश्वरम लेकिन नयी योजना के अनुसार कल सबसे पहले पद्मावती देवी के दर्शन करना उसके बाद 10 बजे की ट्रेन से चेन्नई और फिर रामेश्वरम जाने का प्लान बना। इस पोस्ट में बस इतना ही, पद्मावती मंदिर की कहानी अगले पोस्ट में। बस जल्दी ही मिलते है अगले पोस्ट के साथ। 



कुछ बातें तिरुपति बालाजी के बारे में 


तिरुमाला पर्वत पर स्थित भगवान बालाजी के मंदिर की महत्ता कौन नहीं जानता। भगवान व्यंकटेश स्वामी को संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी माना जाता है। हर साल करोड़ों लोग इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। साल के बारह महीनों में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब यहाँ वेंकटेश्वरस्वामी के दर्शन करने के लिए भक्तों का ताँता न लगा हो। ऐसा माना जाता है कि यह स्थान भारत के सबसे अधिक तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही इसे विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थानों में से भी एक माना जाता है।

मंदिर के विषय में अनुश्रुति 
प्रभु वेंकटेश्वर या बालाजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमाला- तिरुपति के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँ, शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिर‍ि' कहलाती हैं। श्री वेंकटेश्वरैया का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर स्थित है,जो वेंकटाद्री नाम से प्रसिद्ध है।
वहीं एक दूसरी अनुश्रुति के अनुसार, 11वीं शताब्दी में संत रामानुज ने तिरुपति की इस सातवीं पहाड़ी पर चढ़ाई की थी। प्रभु श्रीनिवास (वेंकटेश्वर का दूसरा नाम) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात वे 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और जगह-जगह घूमकर वेंकटेश्वर भगवान की ख्याति फैलाई।
वैकुंठ एकादशी के अवसर पर लोग यहाँ पर प्रभु के दर्शन के लिए आते हैं,जहाँ पर आने के पश्चात उनके सभी पाप धुल जाते हैं। मान्यता है कि यहाँ आने के पश्चात व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। 

मंदिर का इतिहास
माना जाता है कि इस मंदिर का इतिहास 9वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है, जब काँच‍ीपुरम के शासक वंश पल्लवों ने इस स्थान पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था, परंतु 15 सदी के विजयनगर वंश के शासन के पश्चात भी इस मंदिर की ख्याति सीमित रही। 15 सदी के पश्चात इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैलनी शुरू हो गई। 1843 से 1933 ई. तक अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत इस मंदिर का प्रबंधन हातीरामजी मठ के महंत ने संभाला। 1933 में इस मंदिर का प्रबंधन मद्रास सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और एक स्वतंत्र प्रबंधन समिति 'तिरुमाला-तिरुपति' के हाथ में इस मंदिर का प्रबंधन सौंप दिया। आंध्रप्रदेश के राज्य बनने के पश्चात इस समिति का पुनर्गठन हुआ और एक प्रशासनिक अधिकारी को आंध्रप्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया।

मुख्य मंदिर
श्री वेंकटेश्वर का यह पवित्र व प्राचीन मंदिर पर्वत की वेंकटाद्रि नामक सातवीं चोटी पर स्थित है, जो श्री स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे स्थित है। इसी कारण यहाँ पर बालाजी को भगवान वेंकटेश्वर के नाम से जाना जाता है। यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है, जिसके पट सभी धर्मानुयायियों के लिए खुले हुए हैं। पुराण व अल्वर के लेख जैसे प्राचीन साहित्य स्रोतों के अनुसार कल‍ियुग में भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात ही मुक्ति संभव है। पचास हजार से भी अधिक श्रद्धालु इस मंदिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं। इन तीर्थयात्रियों की देखरेख पूर्णतः टीटीडी के संरक्षण में है।

मंदिर की चढ़ाई
पैदल यात्रियों हेतु पहाड़ी पर चढ़ने के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम नामक एक विशेष मार्ग बनाया गया है। इसके द्वारा प्रभु तक पहुँचने की चाह की पूर्ति होती है। साथ ही अलिपिरी से तिरुमाला के लिए भी एक मार्ग है।

केशदान
इसके अंतर्गत श्रद्धालु प्रभु को अपने केश समर्पित करते हैं जिससे अभिप्राय है कि वे केशों के साथ अपना दंभ व घमंड ईश्वर को समर्पित करते हैं। पुराने समय में यह संस्कार घरों में ही नाई के द्वारा संपन्न किया जाता था, पर समय के साथ-साथ इस संस्कार का भी केंद्रीकरण हो गया और मंदिर के पास स्थित 'कल्याण कट्टा' नामक स्थान पर यह सामूहिक रूप से संपन्न किया जाने लगा। अब सभी नाई इस स्थान पर ही बैठते हैं। केशदान के पश्चात यहीं पर स्नान करते हैं और फिर पुष्करिणी में स्नान के पश्चात मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं। 
सर्वदर्शनम
सर्वदर्शनम से अभिप्राय है 'सभी के लिए दर्शन'। सर्वदर्शनम के लिए प्रवेश द्वार वैकुंठम काम्प्लेक्स है। वर्तमान में टिकट लेने के लिए यहाँ कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था है। यहाँ पर निःशुल्क व सशुल्क दर्शन की भी व्यवस्था है। साथ ही विकलांग लोगों के लिए 'महाद्वारम' नामक मुख्य द्वार से प्रवेश की व्यवस्था है, जहाँ पर उनकी सहायता के लिए सहायक भी होते हैं।

प्रसादम
यहाँ पर प्रसाद के रूप में अन्न प्रसाद की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत चरणामृत, मीठी पोंगल, दही-चावल जैसे प्रसाद तीर्थयात्रियों को दर्शन के पश्चात दिया जाता है।

लड्डू
पनयारम यानी लड्डू मंदिर के बाहर बेचे जाते हैं, जो यहाँ पर प्रभु के प्रसाद रूप में चढ़ाने के लिए खरीदे जाते हैं। इन्हें खरीदने के लिए पंक्तियों में लगकर टोकन लेना पड़ता है। श्रद्धालु दर्शन के उपरांत लड्डू मंदिर परिसर के बाहर से खरीद सकते हैं।

ब्रह्मोत्सव
तिरुपति का सबसे प्रमुख पर्व 'ब्रह्मोत्सवम' है जिसे मूलतः प्रसन्नता का पर्व माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में एक बार तब मनाया जाता है, जब कन्या राशि में सूर्य का आगमन होता है (सितंबर, अक्टूबर)। इसके साथ ही यहाँ पर मनाए जाने वाले अन्य पर्व हैं - वसंतोत्सव, तपोत्सव, पवित्रोत्सव, अधिकामासम आदि।

विवाह संस्कार
यहाँ पर एक 'पुरोहित संघम' है, जहाँ पर विभिन्न संस्कारों औऱ रिवाजों को संपन्न किया जाता है। इसमें से प्रमुख संस्कार विवाह संस्कार, नामकरण संस्कार, उपनयन संस्कार आदि संपन्न किए जाते हैं। यहाँ पर सभी संस्कार उत्तर व दक्षिण भारत के सभी रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जाते हैं।

रहने की व्यवस्था
तिरुमाला में मंदिर के आसपास रहने की काफी अच्छी व्यवस्था है। विभिन्न श्रेणियों के होटल व धर्मशाला यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इनकी पहले से बुकिंग टीटीडी के केंद्रीय कार्यालय से कराई जा सकती है। वैसे आजकल तो इंटरनेट का जमाना है तो इसकी बुकिंग तिरुमला-तिरुपति देवसंस्थानम की वेबसाइट पर हो जाती है और बुकिंग 2-3 माह पहले करवानी पड़ती है। 

कैसे पहुँचें?
तिरुपति सड़क और रेलमार्ग द्वारा देश के सभी शहरों से जुड़ा है। देश के बड़े शहरों से तिरुपति तक पहुँचने के लिए सीधी रेल सेवा है। इसके अलावा जिन शहरों से तिरुपति तक रेल सेवा नहीं है वो चेन्नई होते हुए तिरुपति जा  सकते हैं। चेन्नई से तिरुपति की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। चेन्नई से तिरुपति जाने के लिए बसें भी बहुतयात में उपलब्ध है। तिरुपति से तिरुमला तक बस से या पैदल जाना होता है। 

मंदिर में दर्शन 
भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में दर्शन चार तरह से होते हैं :
1. ऑनलाइन बुकिंग द्वारा जिसकी बुकिंग https://ttdsevaonline.com पर दो से तीन महीने पहले करनी होती है और दिए गए तारीख को आप दिए समय से 2 घण्टे पहले लाइन में लगना होता है और दर्शन करने में करीब 2 घंटे का वक़्त लगता है। इसकी बुकिंग भी हर घंटे के हिसाब से होती है। इस दर्शन की बुकिंग के लिए 300 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से बुकिंग के समय ऑनलाइन भुगतान करना पड़ता है और  दर्शन के बाद प्रसाद के रूप में 2 लडडू मुफ्त। 
2. अगर आपने ऑनलाइन  बुकिंग नहीं तो तिरुमला स्थित किसी भी बैंक में 1000 रूपए भुगतान करके 300 रूपए वाला कूपन लेकर दिए गए समय से 2 घण्टे पहले लाइन में लगे और 2 घंटे में दर्शन करें। 
3. फ्री दर्शन लाइन इसे सुदर्शन लाइन कहते हैं। यह 12 से 14 घण्टे हॉल में बैठने के बाद दर्शन के लिए छोड़ते हैं। 
4. अगर आप ट्रेकिंग पथ से तिरुपति से तिरुम्माला जाये तो 50 रूपये के पर्ची कटवाना पड़ता है और करीब 10 किमी की आसान चढ़ाई है और दर्शन मात्र 3 घंटे में होंगे और प्रसाद के रूप में 1 लड्डू फ्री। जब आप तिरुपति से तिरुम्माला पैदल जा रहे होते है तो ये यात्री पैदल ही जा रहा है या नहीं ये देखने के लिए पूरे रास्ते में 3-4 जगहों पर चेकिंग होती है। 

रामेश्वरम मंदिर में दर्शन

रामेश्वरम मंदिर में दर्शन के बाद आइये अब चलते हैं रामेश्वरम के अन्य दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करते हैं। मंदिर में दर्शन, पूजा-पाठ, कुछ शॉपिंग आदि करते-करते 10:30 बज चुके थे। लोगों से पूछने पर पता चला कि अन्य स्थानों पर जाने के लिए बस या ऑटो अग्नितीर्थम के पास ही मिलेंगे तो हम एक बार फिर से अग्नितीर्थम के पास आ गए। यहाँ कुछ ऑटो वाले खड़े थे जो रामेश्वरम घूमने के लिए लोगों से पूछ रहे थे। हमने कई ऑटो वाले से बात किया तो सबने सब जगह घुमाकर फिर से यहीं पर या रेलवे स्टेशन तक छोड़ने के लिए 500 रुपए की मांग की। पैसे तो वो ज्यादा नहीं मांग रहे थे पर समय 2 घंटे से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं थे, पर 2 घंटे में इतनी जगह घूम पाना बिल्कुल ही असंभव था। बहुत करने पर एक ऑटो वाला 2:30 घंटे समय देने के लिए तैयार हुआ पर इतना समय भी बिल्कुल अपर्याप्त था, लेकिन ऑटो वाले इस बात की गारंटी ले रहे थे कि इतने समय में सब पूरा हो जायेगा और यदि उनकी बात मानकर हम चले भी जाते हैं तो चेन्नई की तरह यहाँ भी लफड़ा होना निश्चित था। यही सब सोचकर मैंने बस से ही जाना उचित समझा और एक दुकान से पानी लिया और बातों बातों में उनसे बस के बारे में कुछ जानकारी ले लिया और चल पड़े बस स्टैंड के ओर।  


बस स्टैंड अग्नितीर्थम घाट से करीब 200 मीटर उत्तर की ओर है। जब हम वहां पहुंचे तो धनुष्कोडी बीच जाने वाले बस खड़ी थी तो हम लोग बस में बैठ गए। बस खुलने में अभी 15 मिनट बाकी था तो हमने वहां आस पास के लोगो से कुछ जानकरियां लेनी चाही और बिलकुल सटीक जानकारी मिली कि घूमने के लिए बस से जाना उचित नहीं है क्योंकि वापसी में दिक्कत हो सकती है और बस सीधे धनुषकोडि बीच जाएगी और वहीं से वापस आएगी। इस समय एक अच्छी बात ये हुई कि मेरे एक मित्र नरेंद्र शोलेकर ने जिस राजू ऑटो वाले का नंबर दिया था उससे बात हो गई। राजू ऑटो वाले ने भी 500 रुपए माँगा और साथ ही उसने ये भी कहा कि पैसे तो हम भी उतने ही लेगें जितने और लोग मांग रहे है पर मेरे तरफ से समय की कोई पाबंदी नहीं होगी। जितने भी देर आप लोगों को लगे मैं उतना समय देने के लिए तैयार हूँ और मुझे इससे ज्यादा तो चाहिए ही नहीं था क्योंकि एक अनजान जगह पर इतना भरोसा मिलना मुश्किल होता है जो मुझे मिल रहा था। उससे बात होने के बाद हम लोग बस से उतर गए। कुछ ही मिनटों में वो दौड़ता हुआ आ पहुंचा और हमसे बात करने के बाद वो ऑटो लाने चला गया। करीब 10 मिनट बात वो ऑटो लेकर आया तो हम लोग ऑटो में बैठे और चल पड़े सबसे पहले धनुषकोडि बीच की तरफ। 

अब हम चल पड़े थे धनुष्कोडि की राह पर। एक नई जगह को देखने का रोमांच फिर से मन में भर गया।  सबसे ज्यादा उत्साहित तो आदित्या था जो खुद तो रोमांचित हो ही रहा था और साथ ही पापा जी, पापा जी हम लोग कहां तक जायेंगें कहते हुए मुझे भी रोमांचित कर रहा था। कुछ ही देर में ऑटो बाजार को पीछे छोड़ते हुए एक सुनसान और साफ सुथरी सड़क पर आ गई। इस सड़क पर भीड़ नाम की कोई चीज़ नहीं थी, इक्का-दुक्का ऑटो या बस कुछ देर में दिख जाते थे। यहाँ सड़क के दोनों तरफ समुद्र थे। पूरे रास्ते सड़क के दाहिने तरफ समुद्र के किनारे किनारे पानी  को रोकने लिए दीवार बनी हुई थी। सड़क के दाहिने तरफ समुद्र की लहरें उसी चंचलता से किनारों से टकरा रही थी लेकिन बाएं तरफ समुद्र बिलकुल शांत था। राजू (ऑटोवाले) ने दूर किसी ऊँचे टीले की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वही गंधमादन पर्वत है जिसके ऊपर से हनुमान जी लंका गए थे। कुछ आगे चलने पर सड़क के बाएं तरफ दूर में बने एक मंदिर की ओर इशारा करते हुए राजू ने हमें बताया कि वो विभीषण मंदिर है और उसे राम झरोखा भी कहा जाता है और यहीं पर भगवान् राम ने लंका विजय के पश्चात विभीषण का राज तिलक किया था। वैसे ही वह रामेश्वरम में स्थित कुछ जगहों के बारे में बताते हुए ऑटो ड्राइव कर रहा था। बातों बातों में कब समय बीत गया कुछ पता ही नहीं चला और हम धनुषकोडि बीच पर पहुंच गए।

धनुषकोडि बीच पर पहुंचते ही हम अपना सामन ऑटो में ही छोड़कर चल पड़े समुद्र देखने। बस चन्द कदम की दूरी तय करके हम समुद्र के किनारे पहुंच गए। यहाँ भी समुद्र बिलकुल चेन्नई के जैसा दहाड़ रहा था। हम ठहरे मैदानी इलाके में रहने वाले आदमी तो समुद्र को देखकर पागल होना कोई अचम्भे की बात नहीं है तो हो गए हम भी एक बार फिर से पागल बिलकुल वैसे ही जैसे चेन्नई में मरीना बीच पर हुए थे। एक लहर किनारे पर पहुंच भी नहीं पाती कि पीछे से दूसरी लहर उसे धक्का देते हुए आगे निकल जाने की कोशिश करती और तट से टकराकर फिर वापस लौट जाती। हम भी उन आती जाती लहरों के साथ अठखेलियां करने में व्यस्त हो गए और ये अठखेलियां तब तक जारी रही जब तक हम पूरी तरह से भीग नहीं गए। यहाँ तन के साथ हमारा मन भी भीग चुका था और यहाँ से जाने का मन तो बिलकुल ही नहीं हो रहा था। खैर जाना तो पड़ेगा ही सो हम भी यहाँ से चल दिए। किनारे पर आकर सेतु समुद्रम जाने के लिए पता किया तो मालूम पड़ा कि वो यहाँ से 5 किलोमीटर दूर है और कोई गाड़ी आजकल उधर जा नहीं रही है तो पैदल ही जाना पड़ेगा और इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि पुलिस वाले वहां तक जाने देंगे या नहीं। इन बातों से मायूस होकर हम फिर से ऑटो में आकर बैठ गए और सेतु समुद्रम देखने का मेरा सपना अधूरा रह गया। चलो कुछ तो बाकी रहा फिर से आने के लिए इसी बहाने एक बार और रामेश्वरम का चक्कर लगेगा।

अब आइये आएगी की बात करते हैं। धनुषकोडि बीच के बाद हमारा अगला पड़ाव विभीषण मंदिर था तो हम चल पड़े उसी तरफ। हम जिस रास्ते से आए थे उसी रास्ते से वापस जा रहे थे और रास्ते में ही मुख्य सड़क से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर विभीषण मंदिर पड़ता है तो उस मोड़ पर आकर राजू ने ऑटो को उसी रास्ते पर मोड़ दिया और कुछ ही मिनटों में हम राम झरोखा (जिसे विभीषण मंदिर या कोठंडारमार मंदिर भी कहते हैं) के पास पहुंच गए।  मंदिर में दर्शन करने के पश्चात हम वहां भी समुद्र से अठखेलियां करने पहुंच गए गए।  यहाँ समुद्र शांत और पानी बस घुटने भर ही है तो हम भी कुछ दूर तक चले गए और चलते चलते बालू के टापू पर पहुंच गए। यहाँ लोग बालू से अपने अपने नाम की शिवलिंग बना रहे थे तो हम लोग कैसे पीछे रहते और हम सब भी शिवलिंग के निर्माण में लग गए। हमें ये तो पता था कि इनको बनाने से कुछ होने वाला नहीं है और कुछ देर बाद समुद्र की कोई लहर आएगी और अपने साथ इन को बहा कर ले जाएगी। इसी दौरान मेरे एक घुम्मकड़ मित्र किशन बाहेती (घुमक्क्ड़ी दिल से के एडमिन) का भी फ़ोन आ गया और उन्होंने हमें रामेश्वरम में घूमने के लिए कुछ जगहों की जानकारी दी जिसे मैंने राजू को बताया तो उसने मुझे उन कहा कि आप निश्चिंत रहे मैं आपको इन सभी जगहों पर लेकर जाऊंगा।

अब यहीं की दूसरी बात। यहां पर कुछ लोग एक तैरने वाला पत्थर को कहीं से ले आये थे और लोग उसे देखने में व्यस्त थे तो हमारा पागल मन भी लग गया उनको देखने में। हम कभी उस पत्थर को डूबा कर देखते तो कभी हाथ में उठाकर उसके वजन का अंदाज़ लगाते और ये सोचते कि जहाँ 100 ग्राम का पत्थर भी पानी में डूब जाता है यह 15 से 20 किलो का पत्थर पानी में क्यों नहीं डूब रहा। हम उसे डूबा देते और वो फिर से सतह पर आ जाता। पत्थर से छेड़छाड़ करने के बाद उसके मालिक से जब हमने उस पत्थर की एक फोटो लेने की इजाजत मांगी तो उसने बहुत ही अजीब सा जवाब दिया कि यदि आपको इसका फोटो लेना है तो पहले मुझसे 30 रुपए एक फोटो खिचवाना होगा और मैं उसका प्रिंट भी निकाल कर दूंगा उसके बाद आप जितने चाहे उतने फोटो ले सकते हैं। अब सपरिवार इतनी दूर से यात्रा पर आये हैं और कोई फोटो सबकी इकट्ठे तो हो नहीं पाती है तो यहीं पर 30 रूपये देकर एक फोटो बनवा लिया और फिर उसके बाद हर किसी ने अपने हाथ में पत्थर उठाकर एक एक फोटो लिया, तो कुछ ने उसे पानी में डुबाते हुए फोटो लिया और फिर चल पड़े वापसी की राह पर। 

सच कहूं मित्रों तो ये जगह कुछ ही घंटो में मन में ऐसे बस गई कि यहाँ से वापसी में मन उदास हो रहा था और ये बात राजू भी ऑटो चलाते हुए  गौर कर रहा था तभी उसने मुझसे पूछा कि क्या कुछ छूट गया जो आप उदास हैं। अब मैं उसे क्या बताता कि क्या क्या छूट गया। बस यूँ ही बात को टाला और उसके घर परिवार के बारे में पुछा तो उसने सब कुछ ऐसे बता दिया जैसे कोई पुराना मित्र हो। अब तक हम राजू से और राजू हमसे घुल मिल चुके थे तभी वो रास्ते में मिलने वाले हर चीज़ के बारे में हमें बहुत ही विस्तार से बता रहा था और हम उसकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे। सड़क बिलकुल खाली थी और इस खाली सड़क पर ऑटो अपनी पूरी गति से दौड़ता जा रहा था और हवा के दवाब इतना अधिक हुआ कि मेरे सर से टोपी उड़ गई और मैंने इस बात को  इग्नोर कर दिया कि 100 रूपये की टोपी के लिए क्या ऑटो रुकवाना पर बेटे ने टोपी उड़ते हुए देख लिया तो उसने अपनी माँ को बता दिया कि पापा की टोपी उड़ गई और ये बात राजू ने भी सुन लिया और ऑटो को रोकते रोकते हम एक किलोमीटर दूर आ चुके थे। मेरे मना करने के बाद भी राजू ऑटो को वापस उस जगह पर लेके आया जहां टोपी हमारा इंतज़ार कर रही थी। अब ऐसे लोगों के प्रति दिल में अपने आप एक सम्मान जाग जाता है, शायद कोई और ऑटो वाला होता तो वो इतनी दूर एक टोपी के लिए वापस नहीं जाता। 

कुछ देर के सफर के बाद हम फिर से रामेश्वरम शहर में प्रवेश कर चुके थे और राजू हमें सब कुछ समझाता हुआ जा रहा था और बातों बातों में हम कब पंचमुखी हनुमान मंदिर के समीप पहुंच गए और पता भी नहीं चला। ऑटो से उतरकर मंदिर में प्रवेश किये तो बाहर ही काले पत्थर से निर्मित हनुमान जी के पंचमुखी रूप के दर्शन हुए। इसके बाद हम मंदिर के अंदर जाकर अन्य देवी देवताओं के दर्शन किये उसके बाद चल पड़े लक्ष्मण मंदिर। लक्षमण मंदिर हनुमान मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है। हनुमान मंदिर से लक्षमण मंदिर आने के दौरान रास्ते में एक मंदिर के बारे में राजू ने बताया कि वो सीता मंदिर है पर निर्माण कार्यों के चलते अभी बंद है और आगे बढ़ता रहा। कुछ ही देर में वो फिर एक और मंदिर के पास जाकर रुका और उसके बारे में उसने बताया के ये नाग मंदिर है और वहीं नाग कुंड भी था। नाग मंदिर के दर्शन के बाद उसने हमें कुछ और जगह दिखाया और सबसे अंत में हम भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के घर देखने गए, वही गांव की पतली गलियां, ग्रामीण परिवेश बिलकुल मन को मोह लेते हैं। मार्केटिंग के ज़माने में वहीँ पर एक शंख और सीपी बेचने के लिए मॉल बना दिया गया है। जगह को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था जैसे इन गलियों में एक कभी इस देश का एक महान वैज्ञानिक और एक राष्ट्रपति खेला करते थे। 

यहाँ के बाद हम चल पड़े उसी पम्बन ब्रिज को देखने जिसे में रात में अँधेरा होने के कारण देख नहीं सके थे और कुछ देर के सफर के बाद हम पहुंच गए एक ऐसी जगह पर जिसे देखने की तमन्ना लिए हुए हम रामेश्वरम आये थे। यहाँ आते आते एक बात और हुई कि पूरे दिन मेहनत करने के बाद मेरा कैमरा और मोबाइल थक कर सो चुका था और दूसरा कैमरा सुबह से ही होटल में आराम फरमाने में लगा था। पम्बन ब्रिज समुद्र पर बना भारत का पहला रेल पुल है। यही वो पुल है जिसके द्वारा रामेश्वरम पूरे देश से जुड़ा है। इसकी लम्बाई 2.5 किलोमीटर है। इस पुल में कुल 79 पिलर हैं जिसमे से 64 समुद्र के अंदर है। इस पुल को पार करते समय ट्रेन की गति बहुत धीमी रखी जाती है और ट्रेन के गुजरने के बाद एहतियात के तौर पर पुल का निरीक्षण भी किया जाता है। जब ट्रेन पुल को पार कर रही होती है तो ऐसा अहसास होता है जैसे ट्रेन किसी पुल पर से न गुजरकर पानी में ही चल रही है। यहाँ छोटे छोटे जहाज और रंग बिरंगी नावों का मनमोहक दृश्य भी देखने को मिलता है। सबसे अद्भुत पल तब होता है जब रेल पुल के नीचे से जहाजों के गुजरने के लिए पुल को बीच से खोल कर उठा दिया जाता है, पर ये नज़ारा हमें देखने को नहीं मिल सका। कुछ समय यहाँ गुजारने के बाद हम वापस गेस्ट हाउस के लिए चल पड़े और कुछ ही देर में हम रेलवे स्टेशन पहुंच गए। यहाँ आकर हमने राजू को 500 रुपए दिए और अपने कमरे की तरफ चल दिए। अब तक 4 बज चुके थे। कुछ देर आराम करने के बाद हम फिर से एक बार मंदिर की तरफ चल पड़े और इसके भी कई कारण थे, जैसे पहला कारण मंदिर में बने उस लम्बे गलियारे को देखना जिसे सुबह हम लोगों ने नहीं देखा था, दूसरा कारण सुबह से कुछ खाये नहीं थे और इधर उत्तर भारतीय खाना मिल नहीं रहा था जो मंदिर के समीप ही बांगर यात्री  निवास या अग्रवाल भवन में मिलेगा, तीसरा कारण कुछ खरीदारी भी करनी थी। 

फिर से मंदिर की तरफ जाने से पहले  सामान को ठीक से पैक कर लिया गया कि आने के बाद सीधा सामान उठाएं और ट्रेन की तरफ चल दें। ये सब करते करते 4:30 बज चुके थे और  निकल पड़े फिर से मंदिर की तरफ। 15 मिनट के पैदल सफर के बाद हम मंदिर के पश्चिमी दरवाजे पर पहुंच गए और चल पड़े उस लम्बे गलियारे को देखने। इस पूरे गलियारे का चक्कर लगाने में करीब घंटे भर का समय लगा। उसके बाद हम कुछ शॉपिंग करके होटलों की खाक छानने लगे पर जहाँ भी जाते एक ही जवाब मिलता कि खाना 7 बजे मिलेगा तो हम लोगों ने ऐसे ही घूमते हुए 7 बजा दिए। ठीक 7 बजे  एक बार फिर से बांगर यात्री निवास पहुंचे और 70 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 5 लोगों का खाना लिया और खाकर फिर से स्टेशन की तरफ रवाना हो गए। 8:00 बज चुके थे और 8:45 पर हमारी ट्रेन थी इसलिए हमने  पैदल न जाकर 30 रूपये देकर एक ऑटो से स्टेशन आ गए। 8:15 बज चुके थे। हम सबने अपना सामान उठाया और प्लेटफार्म पर आकर ट्रेन का इंतज़ार करने लगे। कुछ देर में ट्रेन भी आ गई और हम ट्रेन में बैठ गए। ट्रेन अपने निर्धारित समय 8:45 पर रामेश्वरम से कन्याकुमारी के लिए प्रस्थान कर गई। पम्बन ब्रिज के पार होने तक हम लोग अपनी बर्थ पर बैठे रहे और उसके बाद अपनी थकान दूर करने के लिए सो गए क्योंकि कल का दिन भी आज की तरह ही बिलकुल व्यस्त रहने वाला दिन होने वाला था। 

अब हम आप सबसे आज्ञा लेते हैं और जल्दी ही मिलते हैं कन्याकुमारी में। 

कुछ बातें धनुषकोडि बीच के बारे में 

यहाँ देवदार और नारियल के पेड़ों की भरमार है। सड़क के दोनों तरफ दूर दूर तक बस समुद्र ही समुद्र, एक तरफ हिन्द महासागर तो दूसरी तरफ अरब सागर। जहाँ तक नज़र जाएगी नीचे नीला समुद्र और ऊपर नीला आसमान ही दिखाई देगा। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ मिथ, रहस्य, रोमांच सब कुछ एक साथ मिलता है। यह जगह रामेश्वरम शहर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस पूरे रस्ते में टूटी-फूटी जर्जर इमारतें, नष्ट हो चुकी रेलवे लाइन और उजड़े हुए आशियानों के निशान हर जगह देखने को मिल जाता है। सन 1964 से पहले यह एक खूबसूरत शहर हुआ करता था और 22 दिसंबर 1964 की रात में आये एक बड़े तूफान ने इस शहर को पूरी तरह तबाह कर दिया। इस तूफान ने हज़ारों लोगों के जिंदगी छीन ली। पूरा शहर वीरान और खंडहर हो चुका था और उसके बाद इसे उसी उजड़े हुए रूप में सदा सदा के लिए छोड़ दिया गया। आजकल कुछ लोगों द्वारा इसे भूतहा शहर भी दर्जा दे दिया गया है। आज भले यहाँ आने के एक मात्र साधन सड़क मार्ग है पर 22 दिसंबर 1964 से पहले तक यहाँ ट्रेन भी आती थी। जैसा कि कुछ लोगों ने बताया कि उस तूफान में ट्रेन सवारियों सहित समुद्र में लापता हो गई और उसका कुछ भी पता नहीं चला।

गंधमादन पर्वत 
रामेश्वरम का एक नाम कभी गंधमादन हुआ करता जो इसी पर्वत के नाम पर था। यह इस द्वीप की सबसे ऊंची जगह है। रामेश्वरम शहर से इस जगह की दूरी करीब 3 किलोमीटर है। यहाँ से पूरा द्वीप दिखाई देता है। यहाँ की एक बात जो सबसे बड़े बात है वो ये कि यहाँ प्रभु श्री राम के  पद चिह्न हैं, जिनका दर्शन करने बड़ी संख्या में लोग यहाँ आते हैं। 

समुद्र देखने का अद्वितीय रोमांच 
पारदर्शी समुद्र की सतह पर तैरते नावों को देखना किसी काल्पनिक सपने की दुनिया में खोने जैसा लगता है। यहाँ कोई शोर नहीं है, कोई भीड़ भाड़ नहीं है, किसी से आगे निकल जाने कोई कोई आपाधापी नहीं  है, अगर कुछ है तो पानी के साथ अठखेलियां। यहाँ रंग बिरंगे कोरल रीफ और शांत पानी के समुद्री जीव जंतुओं और मछलियों को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है जो किसी और बीच पर देख पाना दुर्लभ है। यहाँ समुद्र की भीतर बसी दुनिया को समुद्र  बाहर से भी देख सकते हैं। 

रामेश्वरम के अन्य दर्शनीय स्थान 
रामनाथ स्वामी मंदिर, मंदिर में बना एशिया का सबसे बड़ा गलियारा, अग्नितीर्थम, पम्बन ब्रिज, वैज्ञानिक और भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम का घर,  लक्ष्मण मंदिर, सीता मंदिर, नाग मंदिर, धनुष्कोडी बीच, गंधमादन पर्वत, विभीषण मंदिर, रामसेतु के अवशेष और भी न जाने कितनी जगहें जो देखने लायक है। 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

महाराष्ट्र .रेलयात्रा.

महाराष्ट्र .रेलयात्रा.

22 अगस्त: केरल एक्सप्रेस (12616), नई दिल्ली-11:25, नागपुर-04:00 (आरक्षण)
23 अगस्त: पैसेंजर (51260), नागपुर-08:00, वर्धा-09:45
पैसेंजर (51262), वर्धा-10:05, अमरावती-14:20
कोई भी ट्रेन, बदनेरा से मुर्तजापुर, रात्रि विश्राम- मुर्तजापुर
24 अगस्त: शकुंतला रेलवे नैरोगेज (52131), मुर्तजापुर-07:05, यवतमाल-11:40
52132, यवतमाल-12:10, मुर्तजापुर-16:25
रात्रि विश्राम- मुर्तजापुर
25 अगस्त: नैरोगेज (52137), मुर्तजापुर-07:15, अचलपुर-10:45
52138, अचलपुर-11:15, मुर्तजापुर-14:45
11040, मुर्तजापुर-14:45, जलंब-15:54
रेलबस (71113), जलंब-16:50, खमगाँव-17:10
12810, शेगाँव-19:15, भुसावल-21:05 (आरक्षण)
रात्रि विश्राम- भुसावल डोरमेट्री
26 अगस्त: पैसेंजर (51183), भुसावल-06:30, नारखेड़-16:00
रात्रि विश्राम- नागपुर
27 अगस्त: पैसेंजर (51829), नागपुर-08:00, इटारसी-17:45
कर्नाटक एक्सप्रेस (12627), इटारसी-21:55, नई दिल्ली-10:30 (आरक्षण)

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

A compilation of the official sites of the Indian tourism landscape is listed here.


www.tourismofindia.com (The official site by the Ministry of Tourism, India) is presented in English, Spanish, Dutch and French. It is a wealth of information on India tourism. It is the best place to know India tourism in a nutshell. Different kind of tour ideas and typical circuits are listed based on your interest (beach, heritage, wildlife etc). A good place for self-learning. Also it lists a number of tour operators in your countries.

The following are the official (government run) sites of different state tourism departments and related organizations. Each state has its own policy on tourism and practically competes with the each others to lure people into it.

For example Karnataka, Tamilnadu and Rajastan encourages large number of (low or high spending) tourists. Kerala and A&N encourages small but high spending tourists. Mostly these state policies are made to suite to many local factors like the ecology, infrastructure, kind of themes to offer etc. But there is something for everyone everywhere.

Going through each site itself is a sort of virtual tourism. You can feel the difference in the offering at the sites itself. And you’ll be more confused than convinced about what is right place for you. In simple terms you’ll understand why you need a long vacation in India.

www.wbtourism.com (The Bengali speaking West Bengal is located at the east of India. Exotic in its own way)

www.up-tourism.com (The land of the mythical India. Uttar Pradesh is the home to Taj and the oldest living city in the world, Varanasi)

www.rajasthantourism.gov.in (The seat of Maharajas. Rajastan can be described as a kaleidoscope of culture and customs )

www.rajasthantourismindia.com (The site of Rajastan Tourism Promotion Corporation)

www.tourisminpondicherry.com (Pondicherry, a small but historic place nursing the French nostalgia)

www.orissatourism.gov.in (The Oria speaking land of classical Indian dances. A temple enthu will never be disappointed at Orissa)

www.konark.nic.in (Where the chariot of Sun God rests)

www.nagalandtourism.com (The land of Nagas. Wild, Exotic and buried deep in the beauty of nature, Nagaland is special)

www.keralatourism.org (God’s own country. The backwaters awaits you at the Malayalam speaking Kerala )

www.ktdc.com (The site of Kerala State Tourism Development corporation )

www.jktourism.org (If there is a heaven on earth…..The Jammu & Kashmir is the Mecca & Medina of Indian tourism )

www.patnitop.nic.in (The site of The Patnitop Development Authority)

www.htc.nic.in (Haryana, the land of green have it all for both the adrenalin driven and the lazy )

www.gujarattourism.com (The Gujarati & Sindhi speaking Gujrathis the home of Mohandas Karamchand GANDHI. The land of lions)

www.goatourism.org (Goa,where the east merge with the west, the beach state of India )

www.cgtourism.nic.in (Lost in the wildness of culture, heritage and history Chhattisgarh stands at the heart of India)

www.arunachaltourism.com (Arunachal Pradesh beams at the corner of India where the countless rivers makes jewels for the Himalayas)

www.aptourism.com (The land of Nizams and spicy Biriyani. The Telugu speaking south Indian state of Andhra Pradesh )


www.himachaltourism.nic.in ( Himachal, the mother of all hill stations in India)

www.hptdc.nic.in (Site of Himachal Pradesh Tourism Development Corporation)

www.tamilnadutourism.org (Tamilnadu,the Indus valley of Dravidian civilization has it all )


www.ptdc.nic.in (The land of the Sikhs, the Punjabi speaking Punjab glitters around the Golden Temple )
www.citco.nic.in (The site of Chandigarh Tourism Development Corporation)

www.meghalayatourism.com (Meghalaya , home of clouds. The name says it all)

www.maharashtratourism.gov.in (Maharastra,the land of the Great Maratas has every thing from the puzzling Mumbai to the dark cave complexes of Ajanta)

www.mptourism.com (Madhya Pradesh, the landlocked capital of tribal India. Home to the erotic temples of Khajuraho)

www.kstdc.nic.in (The Chalukyas, Hoysalas, the mighty Vijayanagara Empire all ruled here. The poetry of history marvelously carved on stones are standing mighty at all over the Kannada speaking Karnatadaka)

www.andaman.nic.in (Andaman & Nicobar Islands, lost in the middle of the ocean with exotic beaches and Scuba diving )


www.meadev.nic.in/states/dnh/dnh.htm (Dadra & Nagar Haveli, the tribal beauty at the Arabian sea coast)

www.daman.nic.in (Daman & Diu presents a bizarre mix of the east & the west)

www.lakshadweep.nic.in (Lakshadweep where the blue coral sea fallen in love with the emerald islands)

www.ua.nic.in/site/index.html (Nature's masterpiece at its best. The snowy peaks rises above the valley of flowers.Uttaranchal is a pilgrims paradise & nature lovers dream )

www.assamgovt.nic.in (God painted Assam with green and blue before sending the smiling people there)

www.bihar.nic.in/Depts/Tourism/Tourism.htm (The seat of Buddhism.Bihar is the land of contradictions )

http://delhitourism.nic.in (Delhi can assault all your senses. The epicenter of Indian history)

www.manipur.nic.in (Literally Manipur is a tiny jewel of India)

www.sikkim.nic.in , http://sikkim.nic.in/sws/tour_off.htm (Sikkim,the gate way to the silk route)

www.tripura.nic.in (Thripura is the less known beauty queen of the north east)

www.mizoram.nic.in (Mizoram is the land of Mizos, the friendliest people in India)



सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

uttra khand@ a glance


Day 01 
Delhi - Nainital or Bhimtal (300 kms / 6.5 hrs). Leave Delhi at 7 A.M. Reach Nainital or Bhimtal – the beautiful lake district of Kumaon - at 1.30 P.M. After settling into hotel, visit the shimmering mountain lake for boating or sailing and the bustling mall for local action.

Day 02 
Nainital or Bhimtal. Discover these quaint hill towns. Excursions on foot or horses within Nainital to Snow View (7500 feet asl) or Dorothy’s Seat, Tiffin Top for Himalayan views or near Nainital to Kilbury, Naukuchiatal, Sattal, Khurpatal, Bhimtal. Overnight at Nainital or Bhimtal. 

Day 03 
Nainital or Bhimtal – Ranikhet (60 kms / 2 hrs) or Kausani (115 kms / 3.5 hrs). Leave Nainital / Bhimtal after a relaxed breakfast and reach Ranikhet or Kausani by lunch time. Local sightseeing. Overnight at Ranikhet or Kausani. 

Day 04 
Ranikhet or Kausani. Local sightseeing and excursions. 
Overnight at Ranikhet or Kausani. 

Day 05 
Ranikhet or Kausani to Almora / Binsar (70 kms / 2 hrs). Leave Ranikhet / Kausani after a relaxed breakfast and reach the resorts in Almora (5800-6300 feet asl) / Binsar (7000 feet asl) by lunch time. After settling into the resort imbibe the essence of another natural jewel of Kumaon. Take a short hike to a local Kumaoni village for a taste of the local culture. Overnight at Almora / Binsar. 

Day 06 
Almora / Binsar. Local sightseeing and excursions. Overnight at Almora / Binsar.

Day 07 
Almora / Binsar - Ramgarh or Mukteshwar (90-125 kms / 2.5–3.5 hrs). Leave Almora / Binsar after a leisurely breakfast and enter the picturesque fruit basket of Kumaon – Ramgarh / Mukteshwar. Local sightseeing. Overnight at Ramgarh / Mukteshwar.

Day 08 
Ramgarh or Mukteshwar – Delhi (350 kms / 8 hrs). Depart from Ramgarh or Mukteshwar after breakfast. Reach Delhi in the evening. 

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itinerary 2
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Day 1: Delhi - Nainital
Depart from Delhi to Nainital at 0700hrs. Arrive at Nainital in afternoon . Check in and have late lunch. Take a boat ride at the Naini lake. Overnight at the hotel.

Day 2: Nainital
After breakfast take a ropeway ride to snow point. After lunch depart on a visit to the high altitude zoo. Overnight at the hotel.

Day 3: Nainital – Binsar
After breakfast depart for Binsar. On arrival check into your hotel. After lunch visit Binsar wildlife sanctuary. Overnight at the hotel.

Day 4: Binsar – Almora – Binsar
First half of the day at your leisure. After early lunch take an excursion to Almora- shop for Souvenirs and sweets. Return back to the hotel. Overnight at the hotel.

Day 5: Binsar – Ranikhet
Depart to Ranikhet after breakfast. On the way visit the Chaubatia gardens. Check into your hotel & relax. Overnight at the hotel.

Day 6: Ranikhet – Corbett
Depart to Corbett after breakfast. Have a quick lunch & depart on a jeep safari between 1330hrs to 1730hrs. Overnight at the hotels.

Day 7: Corbett
Take an elephant safari between early in the morning. Have breakfast and relax. Indulge in angling (optional) at the Kosi river. Overnight at the hotel.

Day 8: Corbett – Delhi
Breakfast and take a nature walk with your companion 0630hrs to 0830hrs in the Corbett jungle. After breakfast depart for Delhi for your onward journey.

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

अटूट आस्था का केन्द्र है लखना कालि‍का मंदि‍र

इस मंदि‍र की स्थापना वर्ष 1857 में की गई थी। मालूम हो कि‍ 1857 का स्वाधीनता आन्दोलन में अपना अलग ही महत्व है। इस मंदि‍र की लम्बाई करीब 400 फुट और चौड़ाई करीब 200 फुट है। इस देवी मंदि‍र की खास वि‍शेषता ये है कि‍ ठीक बगल में सैयद बाबा का कच्चा थान है। जो मुसलमानों के लि‍ए श्रद्धा का केन्द्र तो है ही, साथ ही हि‍न्दुओं के लि‍ए देवी मॉ के साथ ही बाबा के प्रति‍ भी समान आस्था का केन्द्र है। हजारों लोग एक साथ दोनों की पूजा अर्चना करते है। लखना के इस कालका देवी मंदि‍र में वर्ष में दो मेले लगते है। एक चैत्र सुधि‍ पूर्णमा को और दूसरा क्वार की नवरात्र में लगता है। दूर-दूर स्थानों से आने वाले लोग अपनी मनोति‍यां मानते है और पूरी होने पर झण्डा और घंटा चढ़ाते है। मान्यता है कि‍ इस मंदि‍र का नि‍र्माण राजाराव जसवन्त सिंह ने कराया था। ऐसा सुना जाता है कि‍ राजा नि‍यमि‍त यमुना नदी पार कर घार में स्थित देवी मंदि‍र के दर्शन करने जाते थे। एक दि‍न यमुना नदी में बहाव अधि‍क होने के कारण मल्लाओं ने भी नाव पार होना असुरक्षि‍त बताया तो राजा बड़े मायूस हो गये और एक पेड़ की छांव में बैठकर दुखी होकर सोच-वि‍चार करने लगे। अचानक देवीय रूप से आग जली और राजा जसवंत सिंह ने उसी स्थान पर देवी मंदि‍र का नि‍र्माण शुरू करा दि‍या। सैयद बाबा के बगल में देवी की स्थापना के बाद एक और देवी मंदि‍र की स्थापना करने का मन बनाया लेकि‍न इससे पूर्व ही राजा का देहावसान हो गया और स्थापना के लि‍ए मंगबाई गई मूर्ति‍ ऊपर के कमरे में रखी हुई है, जि‍सकी पूजा अर्चना परि‍वारी जन करते है। मंदि‍र परि‍सर में ही सैयद बाबा की मजार है जि‍स पर चादर और कौढ़ि‍या बताशे चढ़ाते है। चढ़ावा मुस्लिम खि‍दमतगार देता है। ऐसा मान्यता है कि‍ महामाया तब तक मंनत मंजूर नहीं करती है जब तक सैयद बाबा को चढ़ावा नहीं मि‍लता है। मंदि‍र की देख-रेख लखना राज परि‍वार के लोग करते आ रहे है। इस मंदि‍र में दलि‍त पुजारी ही वर्षों से पूजा करते आ रहे है। साथ ही मंदि‍र में बधाई डालने और ढोलक बजाने का कार्य दलि‍त और कोरी जाति‍ की महि‍लायें करती आ रही है। इसी प्रकार सैयद बाबा की मजार पर भी दूदे खान और गफफार खान की कई पीड़ियां इवादत करती आ रहीं है। इस मंदि‍र के प्रति‍ जि‍तनी आस्था जि‍ले और आस-पास के जनपदों के लोगों की है उतनी ही आस्था डकैतों में भी रही है। पूर्व में अनेकों नामी गि‍रामी डकैतों ने पुलि‍स से बचते-बचाते झंडा चढ़ाने में कामयाब भी रहे। देवी मॉ की ऐसी कृपा रही कि‍ पुलिस की व्यापक कि‍ले बन्दी भी इनका कुछ नहीं बि‍गाड़ सकी। वेष बदलकर दस्यु मोहर सिंह गुर्जर, मलखान सिंह, छवि‍ राम, घनश्याम उर्फ घन्सा बाबा, नि‍र्भय गूजर और महि‍ला दस्यु सुन्दरी फूलन देवी सभी यहां आकर झंडा और घंटा चढ़ा चुके है।

बुधवार, 24 जून 2015

SEX and the city-

SEX and the city-  
                              If an Indian version of he sitcom was to be shot, it would have been ideally located  in khajuraho. It has the largest group of medieval Hindu  and jain temples, famous for their erotic sculpture. But that’s not all to the village. The name khajuraho is derived from the Hindu word khajur meaning date palm.
    The city was once the original capital of the chandel Rajputs. A Hindu dynasty  that ruled this part of Indian from the 10th to the 12th centuries. The khajuraho temples were built over a span of a hundred years from 950to 1050. The chandela capital was moved to mahoba after this time but this village. In Madhya Pradesh continued to flourish for some time.
     The whole area was enclosed by a wall with eight gates. Each flanked by two golden palm trees. There were originally over 80 Hindu temples, of which only 22 now stand in a reasonable state of preservation, scattered over area of about 21 kms.This village is think with history. Khajuraho, a unesco world heritage site was built between 950 AD And 1050 AD.
The sexquisitely sculpted temples are grouped into three division- the western, eastern and southern. These temples were built to celebrate the wedding of shiva and parvati.
     At the temples you see religious sentiments coinciding with artistic genius and human desires. A tourist guides 21st century Indian touch will just complete your visit to the temples. The moods depicted in the sculptures are intringuing. Leaving a lot to one’s imagination.
 From my hotel room, I could see the kandariya mahadeva temple of the westerm group . the sandhya arti(evening prayers)and uoga at the pool lawns transported me to a divine world away from the hustle bustle of daily life. It was exhilarating experience.
   There is an arrangement of an evening show called lightning show conducted in the centeral region ‘lightning show’ conducted in the serene central region from where one can comfortably view all the temples. Flashes of bright colored light are thrown  on these temple and a mellifluous magical voice narrates the entire series of events responsible for the rules of those time and their epical sagas associated with them.
   On a windy evening in a waxing moon sky. The experience is so magical that it only needs to be personally felt so as to effectively visualize the glory of a past famous for mystic love and exuberance of divinity.
     Khajuraho, the city of dates may boast of some special cuisine but trying some fresh dates for sure is an option.
 The city beams with some more colours. A- 45-minute drive to the ‘Raneh Falls’ on narrow rodas dotted by date plams is an experience in itself. While the waterfall is quites is sight during- monsoons, the visit is worth during other months too. Multi-colored rock (remnants of volcanic eruptions)are any photographers delight.