बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

तिरुपति की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। चेन्नई से तिरुपति जाने के लिए बसें भी बहुतयात में उपलब्ध है

तिरुपति बालाजी
तिरुमाला पर्वत पर स्थित भगवान बालाजी के मंदिर की महत्ता कौन नहीं जानता। भगवान व्यंकटेश स्वामी को संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी माना जाता है। हर साल करोड़ों लोग इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। साल के बारह महीनों में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब यहाँ वेंकटेश्वरस्वामी के दर्शन करने के लिए भक्तों का ताँता न लगा हो। ऐसा माना जाता है कि यह स्थान भारत के सबसे अधिक तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही इसे विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थानों में से भी एक माना जाता है।
मंदिर की चढ़ाई
पैदल यात्रियों हेतु पहाड़ी पर चढ़ने के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम नामक एक विशेष मार्ग बनाया गया है। इसके द्वारा प्रभु तक पहुँचने की चाह की पूर्ति होती है। साथ ही अलिपिरी से तिरुमाला के लिए भी एक मार्ग है।
केशदान
इसके अंतर्गत श्रद्धालु प्रभु को अपने केश समर्पित करते हैं जिससे अभिप्राय है कि वे केशों के साथ अपना दंभ व घमंड ईश्वर को समर्पित करते हैं। पुराने समय में यह संस्कार घरों में ही नाई के द्वारा संपन्न किया जाता था, पर समय के साथ-साथ इस संस्कार का भी केंद्रीकरण हो गया और मंदिर के पास स्थित 'कल्याण कट्टा' नामक स्थान पर यह सामूहिक रूप से संपन्न किया जाने लगा। अब सभी नाई इस स्थान पर ही बैठते हैं। केशदान के पश्चात यहीं पर स्नान करते हैं और फिर पुष्करिणी में स्नान के पश्चात मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं।
सर्वदर्शनम
सर्वदर्शनम से अभिप्राय है 'सभी के लिए दर्शन'। सर्वदर्शनम के लिए प्रवेश द्वार वैकुंठम काम्प्लेक्स है। वर्तमान में टिकट लेने के लिए यहाँ कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था है। यहाँ पर निःशुल्क व सशुल्क दर्शन की भी व्यवस्था है। साथ ही विकलांग लोगों के लिए 'महाद्वारम' नामक मुख्य द्वार से प्रवेश की व्यवस्था है, जहाँ पर उनकी सहायता के लिए सहायक भी होते हैं।
प्रसादम
यहाँ पर प्रसाद के रूप में अन्न प्रसाद की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत चरणामृत, मीठी पोंगल, दही-चावल जैसे प्रसाद तीर्थयात्रियों को दर्शन के पश्चात दिया जाता है।
लड्डू
पनयारम यानी लड्डू मंदिर के बाहर बेचे जाते हैं, जो यहाँ पर प्रभु के प्रसाद रूप में चढ़ाने के लिए खरीदे जाते हैं। इन्हें खरीदने के लिए पंक्तियों में लगकर टोकन लेना पड़ता है। श्रद्धालु दर्शन के उपरांत लड्डू मंदिर परिसर के बाहर से खरीद सकते हैं।
ब्रह्मोत्सव
तिरुपति का सबसे प्रमुख पर्व 'ब्रह्मोत्सवम' है जिसे मूलतः प्रसन्नता का पर्व माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में एक बार तब मनाया जाता है, जब कन्या राशि में सूर्य का आगमन होता है (सितंबर, अक्टूबर)। इसके साथ ही यहाँ पर मनाए जाने वाले अन्य पर्व हैं - वसंतोत्सव, तपोत्सव, पवित्रोत्सव, अधिकामासम आदि।
विवाह संस्कार
यहाँ पर एक 'पुरोहित संघम' है, जहाँ पर विभिन्न संस्कारों औऱ रिवाजों को संपन्न किया जाता है। इसमें से प्रमुख संस्कार विवाह संस्कार, नामकरण संस्कार, उपनयन संस्कार आदि संपन्न किए जाते हैं। यहाँ पर सभी संस्कार उत्तर व दक्षिण भारत के सभी रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जाते हैं।
रहने की व्यवस्था
तिरुमाला में मंदिर के आसपास रहने की काफी अच्छी व्यवस्था है। विभिन्न श्रेणियों के होटल व धर्मशाला यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इनकी पहले से बुकिंग टीटीडी के केंद्रीय कार्यालय से कराई जा सकती है। वैसे आजकल तो इंटरनेट का जमाना है तो इसकी बुकिंग तिरुमला-तिरुपति देवसंस्थानम की वेबसाइट पर हो जाती है और बुकिंग 2-3 माह पहले करवानी पड़ती है।
कैसे पहुँचें?
तिरुपति सड़क और रेलमार्ग द्वारा देश के सभी शहरों से जुड़ा है। देश के बड़े शहरों से तिरुपति तक पहुँचने के लिए सीधी रेल सेवा है। इसके अलावा जिन शहरों से तिरुपति तक रेल सेवा नहीं है वो चेन्नई होते हुए तिरुपति जा सकते हैं। चेन्नई से तिरुपति की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। चेन्नई से तिरुपति जाने के लिए बसें भी बहुतयात में उपलब्ध है। तिरुपति से तिरुमला तक बस से या पैदल जाना होता है।
मंदिर में दर्शन
भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में दर्शन चार तरह से होते हैं :
1. ऑनलाइन बुकिंग द्वारा जिसकी बुकिंग https://ttdsevaonline.com पर दो से तीन महीने पहले करनी होती है और दिए गए तारीख को आप दिए समय से 2 घण्टे पहले लाइन में लगना होता है और दर्शन करने में करीब 2 घंटे का वक़्त लगता है। इसकी बुकिंग भी हर घंटे के हिसाब से होती है। इस दर्शन की बुकिंग के लिए 300 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से बुकिंग के समय ऑनलाइन भुगतान करना पड़ता है और दर्शन के बाद प्रसाद के रूप में 2 लडडू मुफ्त।
2. अगर आपने ऑनलाइन बुकिंग नहीं तो तिरुमला स्थित किसी भी बैंक में 1000 रूपए भुगतान करके 300 रूपए वाला कूपन लेकर दिए गए समय से 2 घण्टे पहले लाइन में लगे और 2 घंटे में दर्शन करें।
3. फ्री दर्शन लाइन इसे सुदर्शन लाइन कहते हैं। यह 12 से 14 घण्टे हॉल में बैठने के बाद दर्शन के लिए छोड़ते हैं।
4. अगर आप ट्रेकिंग पथ से तिरुपति से तिरुम्माला जाये तो 50 रूपये के पर्ची कटवाना पड़ता है और करीब 10 किमी की आसान चढ़ाई है और दर्शन मात्र 3 घंटे में होंगे और प्रसाद के रूप में 1 लड्डू फ्री। जब आप तिरुपति से तिरुम्माला पैदल जा रहे होते है तो ये यात्री पैदल ही जा रहा है या नहीं ये देखने के लिए पूरे रास्ते में 3-4 जगहों पर चेकिंग होती है।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

सिर दर्द को दूर करने के लिए आवश्यक है

सिर दर्द को दूर करने के लिए आवश्यक है कि योग व आयुर्वेद का अपने जीवन में अपनाये..अनुलोम विलोम, भ्रामरी करें और फिर धयान 10 मिनट तक करना चाहिए! अयूर्वैदिक दवाई ब्रामी वटी, मेधा वटी, पथ्य आधि काड़ा, Sarswtaaristm, लें तो जरूर लाभ होगा! प्राकृतिक चिकित्सा
नाक के दो हिस्से हैं दायाँ स्वर और बायां स्वरजिससे हम सांस लेते और छोड़ते हैं,पर यह बिलकुलअलग – अलग असर डालते हैं और आप फर्क महसूस करसकते हैं |दाहिना नासिका छिद्र “सूर्य” औरबायां नासिका छिद्र “चन्द्र” के लक्षणको दर्शाता है या प्रतिनिधित्व करता है |सरदर्द के दौरान, दाहिने नासिका छिद्रको बंद करें और बाएं से सांस लें |और बस ! पांच मिनट में आपका सरदर्द “गायब” हैना आसान ?? और यकीन मानिए यहउतना ही प्रभावकारी भी है..===========================अगर आप थकान महसूस कर रहे हैं तो बसइसका उल्टा करें…यानि बायीं नासिका छिद्र को बंद करें औरदायें से सांस लें ,और बस ! थोड़ी ही देर में“तरोताजा” महसूस करें |===========================दाहिना नासिका छिद्र “गर्म प्रकृति”रखता है और बायां “ठंडी प्रकृति”अधिकांश महिलाएं बाएं और पुरुष दाहिनेनासिका छिद्र से सांस लेते हैं और तदनरूपक्रमशः ठन्डे और गर्म प्रकृति के होते हैं सूर्य औरचन्द्रमा की तरह |================प्रातः काल में उठते समय अगर आपबायीं नासिका छिद्र से सांस लेने में बेहतरमहसूस कर रहे हैं तो आपको थकान जैसा महसूसहोगा ,तो बस बायीं नासिका छिद्र को बंदकरें, दायीं से सांस लेने का प्रयास करें औरतरोताजा हो जाएँ |================अगर आप प्रायः सरदर्द से परेशान रहते हैं तो इसेआजमायें ,दाहिने को बंद करबायीं नासिका छिद्र से सांस लेंबस इसे नियमित रूप से एक महिना करें औरस्वास्थ्य लाभ लें |==============तो बस इन्हें आजमाइए और बिना दवाओं के स्वस्थमहसूस करे
सर दर्द से राहत के लिए
1 . तेज़ पत्ती की काली चाय में निम्बू का रस निचोड़ कर पीने से सर दर्द में अत्यधिक लाभ होता है .
2 . नारियल पानी में या चावल धुले पानी में सौंठ पावडर का लेप बनाकर उसे सर पर लेप करने भी सर दर्द में आराम पहुंचेगा .
3 . सफ़ेद चन्दन पावडर को चावल धुले पानी में घिसकर उसका लेप लगाने से भी फायेदा होगा .
4 . सफ़ेद सूती का कपडा पानी में भिगोकर माथे पर रखने से भी आराम मिलता है .
5 . लहसुन पानी में पीसकर उसका लेप भी सर दर्द में आरामदायक होता है .
6 . लाल तुलसी के पत्तों को कुचल कर उसका रस दिन में माथे पर 2, 3 बार लगाने से भी दर्द में राहत देगा .
7 . चावल धुले पानी में जायेफल घिसकर उसका लेप लगाने से भी सर दर्द में आराम देगा .
8 . हरा धनिया कुचलकर उसका लेप लगाने से भी बहुत आराम मिलेगा .
9 . सफ़ेद सूती कपडे को सिरके में भिगोकर माथे पर रखने से भी दर्द में राहत मिलेगी 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

नाथों के नाथ केदारनाथ, हर हर महादेव

नाथों के नाथ केदारनाथ, हर हर महादेव
अब जबकि केदारनाथ के कपाट खुलने की तिथि की घोषणा हो चुकी है तो मैं केदारनाथ के दर्शनों को जाने वाले शिवभक्तों के लिए छोटी सी जरूरी जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।
*1. केदारनाथ क्यों जाएं?*
केदारनाथ जाने की कई वजहें हो सकती हैं जिनमें पहली वजह धार्मिक ही है। केदारनाथ एक पवित्र तीर्थ स्थल है जहां भगवान शंकर का ग्यारहवां ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यदि आप धार्मिक वजह से न भी आएं तो प्राकृतिक नजारों को देखने के लिए यहां आ सकते हैं, पर मौज मस्ती के उद्देश्य से यहां कभी नहीं आएं।
*2. केदारनाथ कैसे जाएं?*
केदारनाथ की यात्रा सही मायने में हरिद्वार या ऋषिकेश से आरंभ होती है। हरिद्वार देश के सभी बड़े और प्रमुख शहरो से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। हरिद्वार तक आप ट्रेन से आ सकते है। यहाँ से आगे जाने के लिए आप चाहे तो टैक्सी बुक कर सकते हैं या बस से भी जा सकते हैं। हरिद्वार से सोनप्रयाग 235 किलोमाटर और सोनप्रयाग से गौरीकुंड 5 किलोमाटर आप सड़क मार्ग से किसी भी प्रकार की गाड़ी से जा सकते है। इससे आगे का 16 किलोमाटर का रास्ता आपको पैदल ही चलना होगा या आप पालकी या घोडा से भी जा सकते हैं। रास्ता भी बहुत बहुत संभल कर चलने वाला है। हरिद्वार या ऋषिकेश में से आप जहाँ से भी यात्रा आरम्भ करें गौरीकुंड तक पहुँचने में 2 दिन लें। आप रात्रि विश्राम श्रीनगर (गढ़वाल) या रुद्रप्रयाग में करें और अगले दिन गौरीकुंड जाएं। यदि आप एक दिन में गौरीकुंड चले जाते हैं तो इस पहाड़ी रास्ते पर आप इतना अधिक थक जायेगें कि अगले दिन प्रतिकूल मौसम वाले जगह में गौरीकुंड से केदारनाथ की चढ़ाई चढ़ने में बहुत ही दिक्कत महसूस करेंगे। अच्छा यही होगा आप 2 दिन का समय लें ऐसा मेरा मानना है और मेरा अनुभव भी है। हरिद्वार के रास्ते में आपको बहुत ऐसे स्थान मिलेंगे जहाँ आप रात में रुक सकते हैं। पर इन जगहों में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग लगभग आधी दुरी पर है। आप चाहे तो गुप्तकाशी में भी रुक सकते हैं और यदि आप पहले दिन हरिद्वार या ऋषिकेश से गुप्तकाशी तक पहुँच जाते हैं तो अगले दिन गौरीकुंड में रुकने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि गुप्तकाशी से गौरीकुंड 1 से 1ः30 घंटे का ही रास्ता है। आप अपना सामान होटल या गेस्ट हाउस में लाॅकर रूम में रखवाकर गुप्तकाशी से सुबह जल्दी 6 बजे तक निकल जाएँ और 8 बजे तक गौरीकुंड से चढ़ाई करना शुरू कर दें। शाम तक केदारनाथ पहुंचे दर्शन करे और रात में केदारनाथ में रुकें। यदि चाहे तो सुबह फिर से दर्शन करे और फिर वापस गौरीकुंड आ जाये और फिर गौरीकुंड से गुप्तकाशी आकर रात में रुकें। यदि आप पहले दिन श्रीनगर या रुदप्रयाग में रुकते हैं तो अगले दिन आप सारा सामान साथ में ले जाये और गौरीकुंड तक पहुचे और रात में गौरीकुंड में ठहरें। और फिर उसके अगले दिन सामान लाॅकर रूम में रखकर सुबह 5 बजे चढ़ाई शुरू कर दें। केदारनाथ पहुँच कर दर्शन करे फिर रात में रुकें या वापस गौरीकुंड वापस आ जाये। पर मेरा तो ये मानना है कि यदि आप केदारनाथ जाते है तो भोलेनाथ की उस धरती पर एक रात अवश्य गुजारें। एक बात और गौरीकुंड से केदारनाथ के रास्ते में दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है जो करीब 2 से 3 बजे तक खराब ही रहता है और ये कोई एक या दो दिन नहीं बल्कि हर दिन होता है।
बस से जाने के लिए आपको पहले रुद्रप्रयाग जाना होगा। रुद्रप्रयाग से दो रास्ते हो जाते हैं। एक रास्ता केदारनाथ और दूसरा बद्रीनाथ जाता है। हरिद्वार या ऋषिकेश से बस मिलती है जो देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग होते हुए चमोली जाती है और चमोली से गोपेश्वर तक जाती है। उसी बस से आप रुद्रप्रयोग तक का सफर कर सकते हैं। रुद्रप्रयाग से गौरीकुण्ड तक के सफर के लिए पहले सोनप्रयाग तक जाना होगा। सोनप्रयाग तक जाने के लिए रुद्रप्रयाग से सीधी बसें या जीपें मिल जाती है और यदि नहीं भी मिले तो गुप्तकाशी तक जा सकते हैं और उसके बाद गुप्तकाशी से सोनप्रयाग। सोनप्रयाग पहुंचकर वहां से जीप द्वारा गौरीकुण्ड तक पहुंचे। गौरीकुंड से केदारनाथ का रास्ता पैदल का है। यहाँ से पैदल, पालकी या घोड़े पर जा सकते है।
*3. केदारनाथ कब जाएं?*
केदारनाथ आने के लिये मई से अक्टूबर के मध्य का समय आदर्श माना जाता है क्योंकि इस दौरान मौसम काफी सुखद रहता है। भारी बर्फबारी के कारण केदारनाथ के मूल निवासी भी सर्दियों में पलायन कर जाते हैं। वैसे भी ये मंदिर केवल गर्मियों ही खुलता है। हर साल मंदिर खुलने में और बंद होने में कुछ दिनों को फर्क होता है क्योकि इसके लिए मुर्हूत निकाला जाता है हिंदी पंचांग के अनुसार होता है। कपाट खुलने की तिथि अक्षय तृतीया और बंद होने की तिथि दीपावली के आसपास होती है। बरसात के मौसम में जाना यहाँ ठीक नहीं होता क्योकि इस दौरान लैंड स्लाइडिंग का खतरा बढ़ जाता है और सड़के बंद हो जाती है। यात्री यहाँ वहां फँस जाते हैं।
*4. केदारनाथ के रास्ते में विभिन्न स्थनों की दूरियां 
दिल्ली से हरिद्वार : 250 से 300 किलोमीटर
हरिद्वार से ऋषिकेश : 24 किलोमीटर
ऋषिकेश से देवप्रयाग : 71 किलोमीटर
देवप्रयाग से श्रीनगर : 35 किलोमीटर
श्रीनगर से रुद्रप्रयाग : 32 किलोमीटर
रुद्रप्रयाग से दो रास्ते : एक रास्ता केदारनाथ और दूसरा रास्ता बदरीनाथ
रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी : 45 किलोमीटर
गुप्तकाशी से सोनप्रयाग : 31 किलोमीटर
सोनप्रयाग से गौरीकुंड : 5 किलोमीटर
गौरीकुंड से केदारनाथ : 16 किलोमीटर (नया रास्ता और पैदल चढ़ाई)

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

भारेश्वर मंदि‍र

 और प्राचीन मंदि‍र दूसरा नहीं भरेह का इति‍हास तो बक्तप के पंछि‍यों सा उड़ गया लेकि‍न अपने पद चि‍न्ह यहां के भारेश्वर मंदि‍र और कि‍ले के अवशेषों रूप में छोड़ गया। भारेश्वर मंदि‍र का नि‍र्माण भी कि‍ले के नि‍र्माण काल से ही जुड़ा़ हैं। इटावा जनपद में भारेश्वर मंदि‍र जि‍तना वि‍शाल और प्राचीन दूसरा मंदि‍र नहीं है। मंदि‍र का नि‍र्माण पंचायत शैली में रहा होगा परन्तु अब इसका अस्‍ि‍तत्व अत्यधि‍क क्षीण हो गया है। इटावा और औरैया क्षेत्र के नि‍कटवर्ती मंदि‍रों (देवकली और टि‍क्सी) में दुर्ग वास्तु की स्पष्ट छाप मि‍लती है। टि‍क्सी ओर देवकली से भी प्राचीन भारेश्वर मंदि‍र है। ऐसा प्रतीत होता है कि‍ दूर्गस्थापत्यत को मंदि‍र वास्तु में समावेश करने की प्रकि‍या का प्रारम्भं भारेश्वर से ही हुआ। भारेश्वर मंदि‍र एक अति‍ वि‍शाल जगती (मंदि‍र का चबूतरा)पर स्थापि‍त है। प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है। दांए पार्श्व में यमुना और चम्बेल की वि‍स्तीर्ण जलधाराएं आपस में मि‍ल रही हैं। भारेश्वर महादेव के अभि‍षेक के लि‍ये दोनों नदि‍यां पहले प्रति‍स्पर्धा करतीं रहीं और अंत में दोनों ने संयुक्तं रूप बनाकर आने का नि‍र्णय कर लि‍या हो। प्रकृति‍ की इस छटा का अवलोकन मंदि‍र के प्रत्येक स्थान से होता है। मंदि‍र के दाएं पार्श्व को बहुत मजबूती से गढ़ा गया है। दीवार में बुर्ज और समतल स्थांन अलग से बने हैं। दीवार के मध्य‍ में रक्षक स्तम्भ भी हैं। इनमें पानी नि‍कलने का भी स्था‍न है। दीवार और उसके ऊपर समतल स्थातन का प्रयोग बाढ़ रक्षा तथा बढ़े-ग्रस्तों की सहायता के लि‍ये कि‍या जाता रहा होगा। मंदि‍र की अधि‍क ऊचांई का कारण भी नि‍कटवर्ती नदि‍यों से बाढ़ रक्षा का रहा होगा। सीढ़ि‍यों से मंदि‍र के गर्भग्रह की ओर जाने के लि‍ए सीढ़ि‍यों की संख्या एक सौ आठ बताई जाती है। प्रत्येक सीढ़ी आठ इंच के लगभग मोटी है। चारदीवारी के नीचे सामरि‍क महत्व का एक लम्बा बरामदा है। बरामदे में दाई और भूतल ने नीचे की ओर तहखानों के लि‍ये सीढ़ि‍यॉ चली गई हैं। बरामदा लगभग 5 फि‍ट चौड़ा है। बरामदे के बाहर मराठा शैली में नदी की ओर छतरि‍यॉ बनी हुई है। यह छतरि‍यॉ पतले स्तम्भों पर टि‍की है। मंदि‍र की सीढ़ी मार्ग पर लगभग 50 सीढि‍यां चढ़ने के पश्चात पुन: सुरंग जैसा लम्बा बरामदा है। इन बरामदों का सभवत सैनि‍कों के लि‍ये प्रयोग कि‍ये जाने की योजना थी। मंदि‍र मार्ग में इस प्रकार के सामरि‍क महत्व के बरामदों और छतरि‍यों का होना तत्कालीन वि‍देशी आक्रमणों के समय मंदि‍रों को नष्ट करने के लि‍ये होने वाले हमलों की याद दिलाता है। मंदि‍र के पूर्ण अधि‍ष्ठा पन पर प्राचीन मूर्तिया के अवशेष वि‍खरे पड़े हैं। इन मूर्ति‍या में वराह,सूर्य ,लक्ष्मी और महि‍ष्मार्दिनी के अंकन है। इस प्रकार के अंकन 10 बीं से 12 बीं शताब्दि‍यों के मध्यन प्रचुर मात्रा में कि‍ये गये। उपर्युक्ती कालखण्ड् में काल प्रस्तेर का प्रयोग कि‍या गया जो यहां के मूर्तिशि‍ल्पव में भी है। भारेश्वोर मंदि‍र का शि‍खर भी दुर्ग स्थाहपत्यभ का अनुपम उदाहरण है। मंदि‍र का स्कयन्धर भाग अत्यकन्त‍ सुदृढ़ पत्थिरों और ईटों से नि‍र्मि‍त है। कि‍ले के ही समान गुम्बाज के ठीक नीचे कपि‍शीर्ष बने हैं। इनका प्रयोग शत्रु से मोर्चा लेते समय बाण वर्षा और पत्थ र फेंकने के लि‍ये कि‍या जाता था। गुम्बकज दोहरी बास्तु् शैली में नि‍र्मि‍त है। गुम्बथज के शीर्ष तक पहुंचने के लि‍ये जटि‍ल शैली में सीढ़ि‍यों का नि‍र्माण कि‍या गया है। शीर्ष पर तड़ि‍त के स्था।न पर पत्थेर का एक लघु गोल स्त म्भल है शि‍खर के बाहरी भाग पर ही मूर्ति शि‍ल्पह का अंकन है। मूर्तिशि‍ल्प में हाथी तथा घड़ि‍याल जैसी आकृति‍यॉ है। एक स्थाबन पर कच्छ प की भी आकृति‍ है। इन प्रमाणों के आधार पर भारेश्व्र महादेव में शक्‍ि‍तपीठ भी रही होगी क्यों कि‍ गज का सम्बीन्ध‍ लक्ष्मीर,घड़ि‍याल का सम्बेन्धश दुर्गा(शेर से पहले घड़ि‍याल ही दुर्गा का वाहन था) तथा कच्छतप का सम्बीन्धी यमुना से है। पत्थपर की मूर्तिशि‍ल्पभ पर सीमेंट का भी प्रयोग है। मंदि‍र के गर्भगृह में विशाल शि‍वलि‍गं की स्थाटपना है। गर्भग्रह में अन्द(र की ओर प्रति‍मा-फलक स्थापपना के लि‍ये स्थाभन छोड़े गये हैं। शि‍खर के नीचे प्राय: देवि‍यों के लि‍ये नवरात्र में चढ़ाये जाने वाले झण्डेक, रखें हुये हैं जो मंदि‍र की प्रतीकात्मेक श्रद्धा की अभि‍व्यिक्‍ि‍त करते हैं। यहां शि‍वरात्रि‍ के अवसर पर भरेह के राजवंश की ओर से वि‍शाल मेले का भी आयोजन होता है।

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

अगली बार शिलोंग चेरापूंजी का प्लान बने तो गारो हिल्स भी जोड़ना अपनी लिस्ट में... और अगर विद फैमिली हो, तब तो ज़रूर ही ज़रूर जाना...

जनाब, पूर्वोत्तर से दूर बैठकर इसकी बातें करना बड़ा आसान है... "बेइंतिहा खूबसूरती" की कल्पना करना बड़ा सहज है... मोस्ट पॉपुलर टूरिस्ट सर्किट में घूमकर चले जाना और फिर कहना कि इधर तो बच्चा बच्चा हिंदी जानता है... ढाई हजार के कमरे में बैठकर मेहमाननवाजी की बातें करना...
अरे, कभी रिमोट में जाओ... असली दुनिया मिलेगी... दो दिन भी टिक जाओ तो कहना... मेघालय में 11 जिले हैं... शिलोंग, चेरापूंजी एक ही जिले में हैं... यही टूरिस्ट सर्किट है... इसके अलावा 10 जिले और भी हैं... गारो हिल्स में 5 जिले हैं... या शायद 4... और बड़े खतरनाक फीडबैक मिल रहे हैं उधर के...
उग्रवादी गतिविधि, जीरो टूरिज्म, बांग्लादेश बॉर्डर, चुनावी माहौल... अगली बार शिलोंग चेरापूंजी का प्लान बने तो गारो हिल्स भी जोड़ना अपनी लिस्ट में... और अगर विद फैमिली हो, तब तो ज़रूर ही ज़रूर जाना...
कल जब मैंने लिखा था कि मेघालय में हिंदी नहीं है, तो एक मित्र ने मुझे झूठा बोल दिया था... वो ज़रूर शिलोंग, चेरापूंजी से ही लौट गया होगा... यह फोटो जोवाई का है, जहाँ हम चिकन समोसा लेते-लेते बाल-बाल बचे और सब्जी पराँठा इस उम्मीद में खा रहे हैं कि आलू की सब्जी में चिकन, बीफ या पोर्क नहीं होगा...


सुबह गुवाहाटी से चले... लेकिन शिलोंग ने बिल्कुल भी आकर्षित नहीं किया... मुझे शहर पसंद नहीं, भले ही वो कितना ही बड़ा 'टूरिस्ट प्लेस' हो... शिलोंग पीक ज़रूर गये, लेकिन बुध को वो बंद रहती है... जोवाई आ गये... सड़क ने दिल जीत लिया... जोवाई में रुकना था...
पहला होटल... एक महिला... औसत कमरा... हरद्वार में तीन तीन सौ के मिलते हैं ऐसे कमरे... कितने का है?... सत्रा सौ... मुझे सत्रह सौ सुनायी पड़ा... दोबारा बताओ, हाऊ मच?... सत्रा सौ... इस बावली को हिंदी नहीं आती... मेघालय में हिंदी नहीं है... शायद सात सौ को सत्रा सौ बोल रही है... या फिर सात सौ ही बोल रही होगी, लेकिन मेरे कान बज रहे हैं...
फिर वो आयी अंग्रेजी पे... वन थाउजेंड सेवन हंड्रेस... मेरे दीदे फ़टे रह गये... यह तो वाकई सत्रह सौ कह रही है... मोलभाव करूँ भी तो कितना!... आठ सौ... नाईं...
दीप्ति ने पूछा... कितने का है?... सत्रह सौ का... चक्कर खाकर गिरने से बाल बाल बची...
...
जोवाई में और होटल ढूंढने लगे... अचानक समोसे दिख गये... रुक, रुक... कमरा तो होता रहेगा, लेकिन समोसा फिर ना मिलेगा...
... तो फिलहाल की कहानी ये है कि कमरा तो 800 का मिल गया, लेकिन हम समोसे नहीं 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा..... भाग-3

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा..... भाग-3

सभी मित्रों को नमस्कार।

 अपनी वैष्णो देवी यात्रा का तीसरा भाग लेकर मैं आपके सामने हाजिर हूं। पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि हमने बाणगंगा के ठंडे पानी में स्नान किया, ओर चित्र आदि खींचे।

अब उससे आगे.....


               स्नान आदि करने के बाद हम यात्रा पूरी करने के लिए निकल पड़े। हम मुश्किल से 50 मीटर भी नहीं गए होंगे कि कुछ दुकानदार आवाज़ लगाकर हमे रोकने लगे...अरे भैया रुको!! अरे भैया रुको!! हमने बोला भाई! हमे कुछ नहीं लेना, लेकिन हमारे पीछे एक बंदा भागा भागा आ रहा था ओर हमे रुकने के लिए आवाज़ लगा रहा था। वह व्यक्ति केवल मात्र गमछे में था जो उसने लुंगी की तरह लपेट रखा था। वह आकर हमसे बोला कि भाई जी आप अपना बैग चेक करवाओ।  मैं बोला भाई पहले सांस ले ले और ये बता कि ऐसा क्या हो गया जो आप हमारे पीछे आरे हो भागते हुए??  तो उसने कहा कि जहां आपने अपना बैग रखा था, उसके पास मेरे कपड़े भी रखे थे और जब मैं नहाकर फारिग हुआ तो देखा कि मेरा मोबाइल मेरी जेब में नहीं है। मैने एक क्षण की देरी न करते हुए तुरन्त अपना बैग उसके हाथों में थमा दिया और कहा कि भाई जी जल्दी चेक करलो। उसने मेरे कपड़े इधर-उधर करके अच्छी तरह से बैग को चेक किया। बैग में उसका मोबाइल होता तो ही मिलता ना, जब था ही नहीं तो मिलेगा कहां से। खैर, जो हमारा फर्ज बनता था हमण्ड तो पूरा किया। उसकी चेकिंग करने के उपरांत मैंने उसे बोला कि भाई बैग में तो नहीं है, आप एक काम करो कि आप हमारी जेब भी चेक कर लो। उसने बोला कि नहीं नहीं भाई, नही नही भाई , आपने नही उठाया होगा। आप उठाते तो खुद चेक करने के लिए क्यों बोलते?? उसकी न के बावज़ूद भी हमने खुद ही उसे अपनी जेब चेक करवाई। मोबाइल उसमें भी नहीं था। तब वह व्यक्ति क्षमा मांग कर चला गया।  हम भी इस बात को भूल कर आगे को चल दिए।


              रास्ते में सब भक्त माता के जयकारे लगाते हुए आ-जा रहे थे। हम भी उनके जयकारों का जवाब जयकारों से देते हुए चले जा रहे थे। वैष्णो देवी के यात्रा मार्ग में खाने पीने की कोई भी समस्या नहीं है। पर यहां मुफ्त में भंडारे की व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं है परंतु रास्ते में पैसे देकर आप कुछ भी, कभी भी, कहीं भी खा सकते हैं। अब चूंकि वैष्णो देवी जम्मू कश्मीर राज्य में है, तो जाहिर सी बात है कि आपको यहां हिमाचल व उत्तराखंड के मुकाबले महंगी चीज मिलेगी। मैने स्वयं अनुभव किया कि मैग्गी की प्लेट उत्तराखंड ओर  हिमाचल में आपको 30 रुपए में आसानी से उपलब्ध हो जाती है , परंतु जम्मू कश्मीर में वही प्लेट आपको 40 रुपयेी की देते हैं। कारण पूछो तो फिर वही घिसा-पिटा बहाना.... के भाई जी। पहाड़ी एरिया है, transport के खर्चे ज्यादा हो जाते हैं। आप तुलना करेंगे तो पाएंगे कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई सुदूरवर्ती इलाकों में अगर आपको मैग्गी मिल भी जायगी तो उसका रेट वहाँ 40 रुपये होगा, जो उस हिसाब से बिल्कुल जायज़ है। पर जम्मू कश्मीर में तो यातायात के साधन भी बहुत अच्छे हैं, ओर इतना दुर्गम इलाका भी नही है, फिर भी राम भरोसे सब कुछ चल ही रहा है।
खैर, हम तो अपनी यात्रा को जारी रखते हैं। बाण गंगा घाट पर स्नान के बाद हम चलते रहे। खाना पीना तो कुछ था ही नहीं, तो सिर्फ अपने सांस को सामान्य करने के लिए हम रुकते थे।  बीच में कहीं 2 मिनट बैठ गए,  नहीं तो चलते ही रहे। उसके बाद जहां हमने सबसे अधिक विश्राम किया ओर चाय पी,  वह स्थान था अर्धकुंवारी। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है, उस समय मैं कोई 5 साल से भी कम उम्र का होऊँगा, जब मैं परिवार सहित माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आया था। उस समय मैंने अर्धकुंवारी गुफा के दर्शन किए थे, जिसकी स्मृति आज भी मेरे मानस पटल पर जीवित है। उसके बाद से वैष्णो देवी की यह मेरी चौथी यात्रा थी, पर बीच की तीन यात्राओं में कभी भी अर्धकुंवारी के दर्शन नहीं हुए। इस यात्रा में भी नहीं होते, पर उस समय यहां एक रोमांचक घटना घटी।
 अर्धकुंवारी दर्शन के लिए जो पर्ची उपलब्ध रहती है, हमने वो पर्ची काउंटर पर जाकर कटवाई। पर अगर आप आज पर्ची कटवाते हो तो आपको कल दर्शन होंगे। यदि आप कल कटवाते हो तो आपको अगले दिन दर्शन होंगे। कहने का तात्पर्य है कि अर्धकुंवारी पर इतनी अधिक भीड़ रहती है कि आपका उसी दिन नंबर पड़ना  बहुत मुश्किल है। हम अपनी पर्ची कटवाकर नीचे आए। हम सोच रहे थे कि 1 कप चाय और पी ली जाए कि तभी एक व्यक्ति हमारे पास आया। वह पूछने लगा कि क्या हमने उसके साथियों को देखा है?? हमने कह दिया कि भाई नहीं, हमने तो नहीं देखा। तब अचानक से उसे उसके साथी मिल गए। उनके पास अर्धकुंवारी की जो पर्ची थी, वो उसी तारीख की ही थी, लेकिन उनकी ट्रेन उस दिन शाम की थी,तो उनका विचार गुफा के दर्शन नही करने का था। बातों बातों में मैंने भी जिक्र चलाया कि भाई, यहां तो इतनी भीड़ है कि माता के दर्शन के लिए नंबर भी नहीं लगता तो उसने कहा कि भाई! हम तो दर्शन नहीं कर पाएंगे, आप ऐसा करो मेरी पर्ची ले लो और आप लोग दर्शन कर लो। उसके पास 7 व्यक्तियों की पर्ची थी पर पर्ची 7 जनों की और हम 2 । हमने पर्ची लेकर उस व्यक्ति का बहुत-बहुत धन्यवाद किया और उसके उपरांत वह चला गया।

                तभी वहाँ हमें मुरादाबाद( U.P.) का रहने वाला एक ग्रुप मिला, जो पास में खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। उस ग्रुप में 8 जने थे तो उनमे से एक आकर हमसे बोला कि भाई जी, हमारा भी कोई जुगाड़ हो सकता है क्या??  मैं बोला कि भाई क्यों नहीं हमारे पास 7 आदमियों की दर्शन पर्ची हैं और हम 2 हैं। आप लोग अगर चाहें, तो आ सकते हैं। उनमें से 5 लोग हमारे साथ वाली पर्ची में हमारे साथ जाने को तैयार हो गए। मैंने और दिवांशु ने अपना सामान लॉकर में जमा करवाया और दर्शन के लिए लाइन में लग गए। लगभग ढाई घंटे के बाद हम अर्धकुंवारी गुफा के मुहाने पर थे ओर मैं मन ही मन माँ का धन्यवाद कर रहा था मुझे दर्शन देने के लिए।


     अर्धकुमारी गुफा एक बहुत संकरी गुफा है, जिसमें से दर्शन करने वाले को रेंग-रेंग कर निकलना पड़ता है। यह गुफा कोई बहुत ज्यादा बड़ी तो नहीं है, लेकिन तंग बहुत है। मान्यता है कि जब श्रीधर के भंडारे से कन्या रूप धारी माँ दुर्गा अंतर्ध्यान हुई थी तो भैरव से बचने के लिए इसी गुफा में माता ने 9 महीने निवास किया था। गुफा के द्वार पर माँ ने लँगूर को प्रहरी बना कर खड़ा किया था। जब लँगूर को हरा कर भैरव गुफा में प्रवेश करने लगा, तो देवी दुर्गा ने अपने त्रिशूल के प्रहार से गुफा के पीछे के भाग को तोड़ा ओर वहां से निकल गईं।


हृदय की बीमारी वाले लोगों को इस गुफा में जाने से बचना चाहिए, क्योंकि बीच में एक जगह ऐसी आती हैं जहां गुफा बहुत सँकरी तो है ही, साथ मे थोड़ा ऊपर भी चढ़ना पड़ता है। गुफा के अंतिम भाग ( जहाँ माता ने त्रिशूल प्रहार किया था) वह बहुत तंग है, ऐसे में हृदय रोग वाले मरीजों को दिक्कत आ सकती है। खैर, हमने सही सलामत गुफा में दर्शन किए और अर्धकुमारी मंदिर से बाहर आ गए। दर्शन उपरांत हमने फटाफट locker से सामान निकाला क्योंकि हल्की हल्की बारिश पड़ने लगी थी। इस बारिश का मतलब था कि अगर हम भीग गए तो समझो बीमार हुए।
 अर्धकुंवारी दर्शन के लिए जो पर्ची उपलब्ध रहती है, हमने वो पर्ची काउंटर पर जाकर कटवाई। पर अगर आप आज पर्ची कटवाते हो तो आपको कल दर्शन होंगे। यदि आप कल कटवाते हो तो आपको अगले दिन दर्शन होंगे। कहने का तात्पर्य है कि अर्धकुंवारी पर इतनी अधिक भीड़ रहती है कि आपका उसी दिन नंबर पड़ना  बहुत मुश्किल है। हम अपनी पर्ची कटवाकर नीचे आए। हम सोच रहे थे कि 1 कप चाय और पी ली जाए कि तभी एक व्यक्ति हमारे पास आया। वह पूछने लगा कि क्या हमने उसके साथियों को देखा है?? हमने कह दिया कि भाई नहीं, हमने तो नहीं देखा। तब अचानक से उसे उसके साथी मिल गए। उनके पास अर्धकुंवारी की जो पर्ची थी, वो उसी तारीख की ही थी, लेकिन उनकी ट्रेन उस दिन शाम की थी,तो उनका विचार गुफा के दर्शन नही करने का था। बातों बातों में मैंने भी जिक्र चलाया कि भाई, यहां तो इतनी भीड़ है कि माता के दर्शन के लिए नंबर भी नहीं लगता तो उसने कहा कि भाई! हम तो दर्शन नहीं कर पाएंगे, आप ऐसा करो मेरी पर्ची ले लो और आप लोग दर्शन कर लो। उसके पास 7 व्यक्तियों की पर्ची थी पर पर्ची 7 जनों की और हम 2 । हमने पर्ची लेकर उस व्यक्ति का बहुत-बहुत धन्यवाद किया और उसके उपरांत वह चला गया।

                तभी वहाँ हमें मुरादाबाद( U.P.) का रहने वाला एक ग्रुप मिला, जो पास में खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। उस ग्रुप में 8 जने थे तो उनमे से एक आकर हमसे बोला कि भाई जी, हमारा भी कोई जुगाड़ हो सकता है क्या??  मैं बोला कि भाई क्यों नहीं हमारे पास 7 आदमियों की दर्शन पर्ची हैं और हम 2 हैं। आप लोग अगर चाहें, तो आ सकते हैं। उनमें से 5 लोग हमारे साथ वाली पर्ची में हमारे साथ जाने को तैयार हो गए। मैंने और दिवांशु ने अपना सामान लॉकर में जमा करवाया और दर्शन के लिए लाइन में लग गए। लगभग ढाई घंटे के बाद हम अर्धकुंवारी गुफा के मुहाने पर थे ओर मैं मन ही मन माँ का धन्यवाद कर रहा था मुझे दर्शन देने के लिए।


     अर्धकुमारी गुफा एक बहुत संकरी गुफा है, जिसमें से दर्शन करने वाले को रेंग-रेंग कर निकलना पड़ता है। यह गुफा कोई बहुत ज्यादा बड़ी तो नहीं है, लेकिन तंग बहुत है। मान्यता है कि जब श्रीधर के भंडारे से कन्या रूप धारी माँ दुर्गा अंतर्ध्यान हुई थी तो भैरव से बचने के लिए इसी गुफा में माता ने 9 महीने निवास किया था। गुफा के द्वार पर माँ ने लँगूर को प्रहरी बना कर खड़ा किया था। जब लँगूर को हरा कर भैरव गुफा में प्रवेश करने लगा, तो देवी दुर्गा ने अपने त्रिशूल के प्रहार से गुफा के पीछे के भाग को तोड़ा ओर वहां से निकल गईं।


हृदय की बीमारी वाले लोगों को इस गुफा में जाने से बचना चाहिए, क्योंकि बीच में एक जगह ऐसी आती हैं जहां गुफा बहुत सँकरी तो है ही, साथ मे थोड़ा ऊपर भी चढ़ना पड़ता है। गुफा के अंतिम भाग ( जहाँ माता ने त्रिशूल प्रहार किया था) वह बहुत तंग है, ऐसे में हृदय रोग वाले मरीजों को दिक्कत आ सकती है। खैर, हमने सही सलामत गुफा में दर्शन किए और अर्धकुमारी मंदिर से बाहर आ गए। दर्शन उपरांत हमने फटाफट locker से सामान निकाला क्योंकि हल्की हल्की बारिश पड़ने लगी थी। इस बारिश का मतलब था कि अगर हम भीग गए तो समझो बीमार हुए।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

त्रिवेंद्रम से दिल्ली : एक रोमांचक रेल यात्रा




14 जून 2017 : आठ दिन से घूमते हुए अब यात्रा बिल्कुल अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी। पद्मनाभ स्वामी मंदिर और कोवलम बीच से आने के बाद अब हमें वापसी की राह पकड़नी थी। तिरुवनंतपुरम् सेंट्रल स्टेशन से हमारी ट्रेन (ट्रेन संख्या 22633) दोपहर 2:15 पर थी। वैसे तो आम दिनों में इस ट्रेन को त्रिवेंद्रम से दिल्ली पहुंचने में 48 घंटे का समय लगता है पर माॅनसून के समय यही ट्रेन दिल्ली पहुंचाने में 52 का घंटे का समय लेती है। एक बजे तक हम लोगों ने सारा सामान पैक किया और खाने के लिए निकल पड़े और स्टेशन परिसर में ही बने फूड प्लाजा में खाना खाया और फिर वापस आकर सामान उठाकर प्लेटफार्म की तरफ चल पड़े। हमें प्लेटफाॅर्म पर पहुंचते पहुंचते 1:45 बज चुके थे। प्लेटफाॅर्म पर गया तो तो देखा कि ट्रेन पहले से ही खड़ी है और अधिकतर यात्री अपनी अपनी सीटों पर बैठ चुके हैं। जब हम अपनी सीट पर गए तो देखा कि कुछ लोग हमारी सीट पर भी कब्जा जमाए हुए हैं। अपनी सीट प्राप्त करने के लिए पहले तो उन लोगों से बहुत देर तक मुंह ठिठोली करनी पड़ी। इस सीट पर से हटाएं तो उस सीट पर बैठ जाएं, वहां से हटाएं तो फिर दूसरी पर। थक हार कर मुझे ये कहना पड़ा कि इस कूपे की सारी सीटें मेरी है। 4 लोगों में से 3 लोग तो आराम से निकल लिए पर चाौथे ने जिद पकड़ रखी थी नहीं जाने की और हमारी भी जिद थी हटाने की, लेकिन फिर हमने सोचा कि चलिए कुछ देर बैठने ही देते हैं फिर देखा जाएगा। इसी दौरान उन महाशय ने ये कह दिया कि क्या आपने ट्रेन खरीद लिया है और इसी बात की जिद से हमने भी उनको सीट से हटा कर ही दम लिया। अपनी ही जगह के लिए इतनी मशक्कत इस यात्रा में पहली ही बार हुआ। खैर मुझे सीट मिल गई और वो भाई साहब कहीं और जाकर बैठ गए।


ट्रेन तिरुवनंतपुरम् सेंट्रल से अपने निर्धारित समय 2:15 पर चल पड़ी। कुछ ही देर में ट्रेन त्रिवेंद्रम शहर के बाहर निकल गई। रेलवे लाइन के दोनों तरफ दूर दूर तक हरे-भरे केले और नारियल के पेड़ के अलावा कुछ और भी दिखाई नहीं दे रहा था। करीब 40 मिनट के सफर के बाद हम कोल्लम जंक्शन स्टेशन पहुंच गए। यहां ट्रेन कुछ देर के लिए रुकी फिर आगे चल पड़ी। जैसा कि केरल के बारे में सुना था वैसी ही खूबसरती रास्ते में दिख रही थी। दूर दूर तक हरियाली के सिवा कुछ भी नहीं था और उसके ऊपर से इस समय यहां माॅनसून का समय था जिससे इस खूबसरती में चार चांद लगा हुआ था। कोल्लम के बाद ट्रेन का अगला पड़ाव कायकुलम था और हम कायकुलम भी समयानुसार ही पहुंच गए। ट्रेन के यहां से चलने के बाद हल्की-हल्की बूंदा-बांदी आरंभ हो चुकी थी जो ट्रेन के सफर की तरह कभी तेज तो कभी कम हो रही थी। ऐसे ही बरसात में ट्रेन अपनी गति से चली जा रही थी और करीब चार घंटे के सफर के बाद हम एरनाकुलम पहुंच गए। एरनाकुलम के बाद शाम ने अपनी दस्तक देनी शुरू कर दी थी जिससे कुछ देर बाद रात्रि के आगमन का आभास होने लगा था। एरनाकुलम के बाद ट्रेन अलुवा नाम के एक छोटे से स्टेशन पर रुकी और हमने यहां प्लेटफार्म पर खाने का सामान बिकता देख तुरंत ही सब लोगों के लिए खाना ले लिया क्योंकि ट्रेन में पेंट्री कार नहीं थी। यहां से ट्रेन के खुलने के बाद हम लोगों ने खाना खाया और सोने की तैयारी करने लगे, इतने में ही थ्रिसूर स्टेशन आ गई।थ्रिसूर से ट्रेन के चलने के तुरंत बाद हम लोग सो गए। इतने दिन की सफर की थकान में नींद ऐसी आई कि कोजीकोड, कन्नूर और मंगलोर से ट्रेन कब गुजर कुछ पता ही नहीं चला और सुबह के करीब चार बजे से जब नींद खुली तो ट्रेन उडुपी स्टेशन पर खड़ी थी। कुछ ही मिनटों में ट्रेन उडूपी को अलविदा कहती हुई अपने अगले पड़ाव कारवार के लिए चल पड़ी जो उडूपी से 190 किलोमीटर दूर थी। कल शाम होने से पहले जो बरसात आरंभ हुई थी वो अभी तक वैसे ही लगातार हो रही थी और रात होने के कारण हम बरसात का लुत्फ उठाने से वंचित रह गए। उडूपी से ट्रेन के खुलने के बाद हम फिर से सो गए और एक ही बार सुबह होने पर ही उठे और उठते ही जो नजारा दिखा उसे देखकर हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इस समय हम पश्चिमी घाट से गुजर रहे थे उसमें भी बरसात के मौसम में। हर तरफ दूर दूर तक बस हरियाली ही दिख रही थी। जहां तक नजर जा रही थी बस बरसात और दूर पहाड़ों पर काले बादलों का बसेरा।

15 जून 2017 : करीब 7:30 बजे हमारी ट्रेन कारवार स्टेशन पहुंच गई और बरसात अभी भी जारी थी। कारवार के पास से ही एक नदी गुजरती है जिसका नाम काली नदी है। यह कर्नाटक की एक प्रमुख नदी है। इस नदी का उद्गम स्थल पश्चिमी घाट में है और यह पश्चिम की ओर बहती हुई कारवार के पास अरब सागर में मिल जाती है। यह नदी मुख्यतः उत्तरी कनार जिले से होकर बहती है। इस नदी की सहायक नदियाँ ऊपरी कनेरी और तत्थीहल्ला हैं। कारवार पहुंचते ही सबसे पहले हमने यहां कुछ खाने की तलाश करना शुरू किया तो स्टेशन पर बड़ा-पाव के अलावा और कुछ भी नहीं मिल रहा था। बड़ा-पाव लेकर हम फिर वापस ट्रेन में बैठ गए। यहां से ट्रेन चलने के बाद अगला पड़ाव मडगांव था। अब मडगांव का नाम सुनकर किसका मन नहीं करेगा यहां घूमने का। मडगांव गोआ का ही एक स्टेशन है। ट्रेन से गोआ जाने वाले कुछ लोग तो वास्को-डा-गामा स्टेशन पर उतरते हैं और कुछ लोग मडगांव स्टेशन। 

ऐसे ही हम गोआ के खयालों में खोए हुए चले जा रहे थे। फिर न जाने मेरे मन में क्या सूझा कि मैंने कंचन से ऐसे ही चिढ़ाने के अंदाज में पूछ लिया कि ऐसा करो आप लोग दिल्ली चले जाओ और मैं एक दिन गोआ घूमकर दिल्ली आ जाऊंगा। इस बात को बोलते समय तो हमने यही सोचा कि मुझ पर कुछ कर्ण-भेदी वाण चलाए जाएंगे पर हुआ इसका उल्टा ही। उन्होंने इस बात के लिए हामी भर दी कि ठीक है हम लोग चले जाएंगे और आप यही उतर जाइएगा क्योंकि उनको भी पता था कि परिवार को बीच रास्ते में तो कोई छोड़ ही नहीं सकता, तो हां कहने में भी कोई गलती नहीं है। ऐसे ही बातों बातों में कब मडगांव आ गया कुछ पता ही नहीं चला, घड़ी पर नजर डाली तो 10 बज चुके थे। अब गोआ घूमने तो जा नहीं सकते तो कम से कम ट्रेन के रुकने पर मडगांव स्टेशन पर तो घूमा ही जा सकता है, तो जैसे ही ट्रेन रुकी हम अपना कैमरा लेकर ट्रेन से बाहर आ गए और कुछ फोटो लेते हुए ऐसे ही स्टेशन का मुआयना करने लगे। ट्रेन यहां करीब आधे घंटे खड़ी रही और अपने समय से 15 मिनट की देरी से ठीक 10:30 बजे यहां से आगे के लिए चल पड़ी।

मडगांव से चलने के बाद ट्रेन एक बड़ी सी नदी को पार कर रही थी जिसका नाम मंडोवी नदी था। इसके कई और नाम हैं जैसे मांडवी, मांडोवी, महादायी या महादेई तथा कुछ स्थानों पर गोमती नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह कर्नाटक और गोवा से होकर बहती है। यह नदी गोवा राज्य की एक प्रमुख नदी है और इसे गोवा राज्य की जीवन रेखा भी कहा गया है। इसकी कुल लंबाई 77 किलोमीटर है जिसमें से 29 किलोमीटर कर्नाटक और 52 किलोमीटर गोवा से होकर बहती है। इस नदी का उद्गम पश्चिमी घाट के तीस सोतों के एक समूह से होता है जो कर्नाटक के बेलगाम जिले के भीमगढ़ में स्थित हैं। नदी का जलग्रहण क्षेत्र कर्नाटक में 2032 वर्ग किमी और गोवा में 1580 वर्ग किमी का है। दूधसागर प्रपात और वज्रपोहा प्रपात इस नदी के ही भाग हैं।

एक तो पश्चिमी घाट और कोंकण रेलवे का सफर ऐसे ही रोमांचक होता है और यदि उसके उपर से बरसात हो रही हो तो ये ट्रेन का सफर केवल रेल यात्रा न होकर एक तरह से स्वर्ग का ही सफर हो जाता है। ऊंची ऊंची पहाडि़यां, दूर दूर तक हरियाली, न जाने कितनी सुरंगों से होकर गुजरती हुई ट्रेन और इसके बाद यदि इस सफर में बरसात हो रही तो सफर का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। पहाड़ों से गिरते झरने इस सफर को और भी रोमांचित बना देते हैं। कभी कोंकण रेलवे के बारे में टीवी और अखबारों में देखा और पढ़ा करता था जो आज खुली आंखों से हमारे सामने था। यदि मैं अपने शब्दों में कहूं तो अब की गई सभी रेल यात्राओं में हमने जितना आनंद नहीं उठाया होगा उससे ज्यादा केवल इसी एक यात्रा में आनंद आया। चलिए अब आगे की बात करते हैं। 

मडगांव के बाद ट्रेन अपने अगले स्टेशन पेरणेम पर कुछ देर रुकी और फिर सिंधुदुर्ग के लिए रवाना हो गई। समूचे रास्ते ऐसे ही लगातार बरसात होती रही। जहां भी ट्रेन कुछ मिनट के लिए रुकती हम झट ट्रेन से बाहर उस बरसात का मजा लेने में व्यस्त हो जाते। यहां एक बात और बताना चाहूंगा वो ये कि इस ट्रेन का टिकट हमने मजबूरी में लिया था, क्योंकि केरला एक्सप्रेस में टिकट मिल नहीं रहा था। जब हमने इस ट्रेन का टिकट लिया था तो हमें ये नहीं पता था कि यही रेल यात्रा मेरे जीवन की सबसे अनोखी और रोमांचक ट्रेन यात्रा होगी, क्योंकि इस ट्रेन से सफर तो पूरे साल में कभी भी किया जा सकता है पर ऐसे दृश्य देखने को हर सफर में नहीं मिलता। कोंकाण रेलवे में दिन का सफर और उसके उपर से बरसात मिलेगी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। ट्रेन चली जा रही थी और हम इन दृश्यों में खोए हुए बस रास्तों को निहारते हुए जा रहे थे और हम कब सिंधुदुर्ग पहुंच गए पता ही नहीं चला। घड़ी देखा तो दोपहर के एक बज चुके थे। मतलब कि हमने लगभग 23 का घंटा सफर हमने पूरा कर लिया था। सिंधुदुर्ग संस्कृत के दो शब्दों सिंधु (समुद्र) और दुर्ग (किला) से मिलकर बना है जिसका अर्थ है समुद्र का किला। इसकी स्थापना शिवाजी ने सन् 1664 में मालवन तालुका के किनारे अरब सागर के एक द्वीप पर किया था। 

सिंधु दुर्ग से ट्रेन के चलने के बाद करीब दो घंटे बाद हम रत्नागिरी पहुंचे। त्रिवेंद्रम से रत्नागिरी तक के 1250 किलोमीटर के सफर को पूरा करने में अब तब 25 घंटे लग चुके थे। रत्नागिरी बाल गंगाधर तिलक की जन्मस्थली है। यह महाराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम भाग में अरब सागर के तट पर स्थित है और यह कोंकण क्षेत्र का ही एक भाग है तथा यह पश्चिम में सहयाद्रि पर्वतमाला से घिरा हुआ है। रत्नागिरि प्रसिद्ध अल्फांसो आम के लिए भी जाना जाता है। कुछ संदर्भां के अनुसार रत्नागिरि का एक संबंध महाभारत काल से भी है। कहा जाता है पांडवों ने अपने वनवास का तेरहवां वर्ष रत्नागिरि के आस पास ही बिताया था। यही वो जगह है जहां कभी म्यांमार के अंतिम राजा थिबू तथा वीर सावरकर को कैद कर रखा गया था।

रत्नागिरी के बाद हमारी ट्रेन का अगला पड़ाव चिपलूण नामक जगह था। चिपलुन एक पिकनिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। इसके पिकनिक स्थल के रूप में विकसित होने के पीछे भी बहुत ही रोचक बात जुड़ी हुई है। ऐसा था कि 80 के दशक में मुंबई से गोवा जाने के लिए प्रतिदिन उड़ाने संचालित नहीं होती थी। उस समय सप्ताह में एक या दो उड़ाने संचालित होती थी। इसलिए पर्यटकों ने सड़क मार्ग द्वारा गोवा जाना आरंभ कर दिया। लेकिन यह रास्ता काफी लंबा पड़ता था। इसलिए रास्ते में एक ऐसे स्थान की जरुरत महसूस की गई जहां पर्यटक आराम कर सकें। ऐसे स्थान को चुनने के लिए होटल ताज ग्रुप ने समाचारपत्रों में विज्ञापन दिया और पर्यटकों से विभिन्न स्थानों के लिए वोटिंग करने को कहा। वोटिंग में 80 प्रतिशत दर्शकों ने चिपलुन के पक्ष में मतदान किया। इस प्रकार एक पर्यटक स्थल के रूप में चिपलुन का जन्म हुआ।

चिपलून के बाद हमारा अगला पड़ाव पनवेल था। ट्रेन हरी भरी वादियों में बहुत सारे सुरंगों से होकर सरपट चली जा रही थी। पनवेल पहुंचने से पहले हमारे व्हाट्स एप और फेसबुक ग्रुप घुमक्कड़ी दिल से के सदस्यों ने हमारी खोज खबर ली कि हम कहां तक पहुंचे तो हमने रत्नागिरी और पनवेल के बीच होने की बात बता दी और बात यहीं खत्म हो गई। कुछ देर बाद ग्रुप के ही एक और घुमक्कड़ सदस्य प्रतीक गांधी ने हमसे केवल इतना ही पूछा कि आपकी ट्रेन पनवेल के बाद किस रास्ते से जाएगी तो हमने पनवेल के बाद वसई रोड स्टेशन का नाम बता दिया। उसके बाद उनका जवाब आया कि हम आएंगे आपसे मिलने। अब देखने के लिए ये एक बिल्कुल छोटा सा मैसेज था पर इस मैसेज के अंदर जो भाव था उस भाव को या तो केवल भेजने वाला या प्राप्त करने वाला ही समझ सकता था। मैंने कंचन को इस बारे में बताया कि एक घुमक्कड़ मित्र हैं, जो मिलने आएंगे। इस बात से वो भी आश्चर्यचकित हो गई। ट्रेन चलती रही और हम पनवेल पहुंच गए। पनवेल से रात 8:45 पर ट्रेन चली और दो घंटे का सफर पूरा करके ठीक दस बजे हमारी ट्रेन वसई रोड पहुंच गई।

जैसा कि प्रतीक गांधी से पहले ही बात हो गई थी कि वो प्लेटफाॅर्म पर आ चुके हैं। मैं भी ट्रेन के रुकने से पहले ही कंचन को साथ में लेकर ट्रेन के दरवाजे के पास आकर खड़े हो गया। ट्रेन के रुकते ही हम जल्दी से ट्रेन से उतरे। मुझे देखते ही प्रतीक जी ने हाथ उपर उठाकर अपनी उपस्थिति का अहसास कराया। ट्रेन से उतर कर उनके पास पहुंचे तो देखा कि प्रतीक भाई के साथ हम घुमक्कड़ों की बुआ दर्शन कौर धनोय भी मुझसे मिलने आई हुई थीं। अब थोड़ा दर्शन कौर के बारे में। दर्शन कौर जी भी एक बहुत बड़ी घुमक्कड़ हैं और घुमक्कड़ी की दुनिया में उनको बुआ का दर्जा प्राप्त है। पहले तो मैं और कंचन दोनों ने बुआ के पैर छूकर आशीर्वाद लिया उसके बाद प्रतीक भाई से भी गले मिला। फिर कुछ फोटो लेने के बाद कुछ आपस में बातें की गई और इतनी देर में ट्रेन के खुलने का समय हो गया। दुबारा फिर से मिलने की बात कहकर नम आंखों से हमने उन दोनों से विदाई ली तब तक ट्रेन खुल चुकी थी। हम ट्रेन में चढ़े और अपनी सीट पर आकर बैठ गए। जाने से पहले बुआ जी ने मेरे हाथ में लडडु का एक डिब्बा दे दिया था। उस डिब्बे में जितने लडडू थे वो तो खत्म हो गए पर उन लडडुओं में जो मिठास थी तो सदा सदा के लिए मेरे मन में बस गई। जब आभासी दुनिया के कुछ लोग वास्तविक दुनिया में मिलते हैं तो उसका वर्णन करने के लिए किसी के पास कोई शब्द नहीं होता है और हमारी मुलाकात भी ऐसे ही हुई। जिन लोगों के बारे में कुछ पता नहीं था, वो लोग इतने प्यार से इतनी रात में अपने घर से दूर स्टेशन पर मुझसे मिलने आए। वसई रोड से ट्रेन के खुलते ही हम सब अपनी अपनी बर्थ पर सो गए। नींद इतनी गहरी आई कि कब सूरत और बड़ौदा गुजर गया पता ही नहीं चला और उस शहर को चाहे स्टेशन ही सही देखने की तमन्ना भी नींद के साथ ही गुजर गई। 

16 जून 2017 : सुबह में करीब 6 बजे के आसपास जब नींद खुली तो ट्रेन बड़ौदा और रतलाम के बीच थी जो धीरे धीरे अपनी गति से रतलाम की ओर बढ़ रही थी। रात में सोने से पहले सफर में हम जो बरसात और हरियाली देख रहे थे उस चीज का इधर नामोनिशान नहीं था। इसी तरह चलते हुए करीब 7:30 बजे हम रतलाम पहुंच गए। 15 मिनट रुकने के बाद ट्रेन अगले पड़ाव कोटा की तरफ चल पड़ी। जैसे जैसे दिन चढ़ रहा था वैसे वैसे सूर्य की तपिश भी बढ़ती जा रही थी। करीब साढ़े तीन घंटे के सफर के बाद 11:15 बजे हम कोटा पहुंच गए। यहां तक पहुंचते पहुंचते दिल्ली वाली गर्मी का अहसास होने लगा था। कोटा स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही हमने कुछ खाने का सामान लिया और फिर वापस अपने सीट पर बैठ गए। ट्रेन के यहां से खुलते ही हम लोगों ने खाना खाया और फिर कुछ देर आराम करने के लिए बर्थ लगाकर सो गए। कुछ देर बाद नींद खुली तो हम सवाई माधोपुर पहुंच चुके थे। कुछ देर बाद यहां से ट्रेन खुली और अगले पड़ाव भरतपुर के लिए चल पड़ी। जो हरे भरे नजारे हमें कल पूरे दिन देखने के लिए मिला इधर दूर दूर तक उनका कोई नामोनिशान नहीं था। दूर दूर तक बंजर पड़े खेत और पहाड़ और उसके उपर से चिलचिलाती धूप। यही तो अपनी भारत भूमि है जो एक ही दिन में हर तरह के नजारे देखने को मिलते हैं। कहीं गर्मी, कहीं सर्दी, कहीं बर्फ तो कहीं बरसात। ट्रेन चलती रही और ठीक 3 बजे हम भरतपुर पहुंच गए। भरतपुर के बाद हमारा अगला पड़ाव मथुरा था। ट्रेन भरतपुर से खुली और एक घंटे के सफर के बाद हम मथुरा पहुंच गए। कुछ देर मथुरा में रुकने के बाद हमारी ट्रेन अपने गंतव्य स्टेशन हजरत निजामुद्दीन स्टेशन के लिए चल पड़ी और करीब 2 घंटे के सफर के बाद अपने निर्धारित समय से 20 मिनट पहलेे 6 बजे ही हजरत निजामुद्दीन पहुंच गए और यहां से आॅटो लेकर घर की तरफ प्रस्थान कर गए। इस रोमांचक ट्रेन यात्रा में हमने कुल 3007 किलोमीटर का सफर तय किया जिसे पूरा करने में करीब 52 घंटे का समय लगा। सच कहूं तो ये ट्रेन यात्रा हमारे जीवन की सबसे अनूठी और रोमांचक यात्रा रही और मुझे नहीं लगता कि आगे भविष्य में कभी ऐसी रोमांचक ट्रेन यात्रा कर पाउंगा। यदि कर भी लिया तो पूरे परिवार के साथ नहीं होउंगा तो वो आनंद नहीं रह जाएगा जो इस यात्रा में आया। कुछ खट्टे मीठे अनुभव के साथ हमारी 10 दिन की यह यात्रा समाप्त हुई। अब हम आपसे आज्ञा चाहते हैं और जल्दी ही एक दूसरे यात्रा वृत्तांत के साथ सामने आपके सामने आऊंगा। तक तक के लिए आज्ञा दीजिए।